Qutub Minar and its Monuments

The Qutub Minar is a towering 73 meter high tower built by Qutub-ud-Din Aibak in 1193. The tower was built to celebrate Muslim dominance in Delhi after the defeat of Delhi’s last Hindu ruler. This tower is the highest tower in India, complete with five storeys and projecting balconies. The first three storeys of the Qutub Minar are made of red sandstone and the last two are made of marble and sandstone. 

The construction of the Qutub Minar was started by Qitub-ud-Din Aibak, but he only constructed the basement. The construction of the tower was later taken over by his successor Iltutmish who constructed three more stories. The last two storeys were completed Firoz Shah Tuglak. The different architectural styles from the time of Aibak to Tuglak are clearly visible in the Qutub Minar. 

Apart from the tower, the Qutub Minar complex comprises of the Quwwat-us-Islam Mosque (the first mosque to be built in India), a 7 metre high iron pillar, the tomb of Iltutmish, Ala’i-Darwaza and the Ala’I Minar.

Entry fee: Free for children under 15, INR 10 for Indians INR 250 for foreigners
Opening hours: Sunrise until sunset, Closed on Mondays
Must visit: Chhatarpur Temple
Tip: This place remains a popular tourist sight despite the damage caused a few years ago.

Why can’t I use my phone during take-off and landing?

There was a time when we had to turn our phones off and store them when flying but now we can keep them on as long as we turn on Airplane Mode.

Anyone who has flown on a plane would be aware that their even before the flight has taken off there will be an announcement asking passengers to turn off devices or put them on to Airplane Mode. Why?

When you make or receive a call, your phone looks for the closest cell tower to connect to. That means your calls may interfere with cell towers on the ground and could even interfere with a plane’s systems. This sort of radio pollution may be problematic especially if, say, 100 passengers’ phones were all busy looking for a connection.

So what would happen if you kept your phone’s cellular functions on 30,000 feet?

Probably nothing.To date no incident has ever been recorded of any phone signal related mishaps even though pilots who have witnessed malfunctioning gauges have placed their suspicious gaze on phone signals. Still airlines and the Federal Aviation Administration (FAA) prefer to err on the better-safe-than-sorry side as there is a tiny risk.

A mobile phone’s potential to interfere does not just exist when it is being used, but also when it is idle. That’s why flight attendants ask that Airplane Mode be activated immediately even if passengers don’t intend to use their phone.

In any case, turning on Airplane Mode will disable the cellular signal on smartphones and mobile-data-enabled tablets but leave other facilities like listening to music, reading, game- playing available to use.

If the airline offers in-flight Wi-Fi – which is becoming commonplace – you will be able to go online to check emails and browse the web.

A matter of etiquette

Wi-fi calls are of course entirely possible. The ability to make a phone call at 3,500 ft has been around since 2008. But who wants to sit next to someone jabbering away on their phone? Or be on a plane full of people yapping away. Can you imagine the noise and how irritating that would be?

संस्कृति का सूचक है राजस्थानी पहनावा…

राजस्थान देश भर में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के रीति- रिवाज, यहां के लोगों का पहनावा तथा भाषा सादगी के साथ- साथ अपनेपन का भी अहसास कराती है। राजस्थान में लोगों को अपनी एकता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के लोगों का रहन-सहन सादा और सहज है। राजस्थान के लोग जीवटवाले तथा ऊर्जावन होते हैं साथ ही जीवन के हर पल का आनंद उठाते हैं। राजस्थानी महिलाएं अपनी सुंदरता के लिए मशहूर हैं।

राजस्थान देश भर में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के रीति- रिवाज, यहां के लोगों का पहनावा तथा भाषा सादगी के साथ- साथ अपनेपन का भी अहसास कराती है। राजस्थान में लोगों को अपनी एकता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के लोगों का रहन-सहन सादा और सहज है। राजस्थान के लोग जीवटवाले तथा ऊर्जावन होते हैं साथ ही जीवन के हर पल का आनंद उठाते हैं। राजस्थानी महिलाएं अपनी सुंदरता के लिए मशहूर हैं।

राजस्थान के लोग रंगीन कपड़े और आभूषणों के शौकीन होते हैं। रहन-सहन, खान-पान और वेशभूषा में समय के साथ थोड़ा-बहुत परिवर्तन तो आया है, लेकिन राजस्थान अभी अन्य प्रदेशों की तुलना में अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं को सहेजे हुए है। राजस्थान में भोजन वहां की जलवायु के आधार पर अलग-अलग प्रकार से बनता है। पानी और हरी सब्जियों की कमी होने की वजह से राजस्थानी व्यंजनों की अपनी एक अलग ही शैली है।

राजस्थानी व्यंजनों को इस तरह से पकाते हैं कि वो लंबे समय तक खराब नहीं होते तथा इन्हें गरम करने की आवश्यकता भी नहीं होती। रेगिस्तानी जगहों जैसे – जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर में दूध, छाछ और मक्खन पानी के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में अधिकतर खाना शुद्ध घी से तैयार किया जाता है। यहां पर दाल-बाटी-चूरमा बेहद मशहूर है। जोधपुर की मावा कचौड़ी, जयपुर का घेवर, अलवर की कलाकंद और पुष्कर का मालपुआ, बीकानेर के रसगुल्ले, नमकीन भुजिया, दाल का हलवा, गाजर का हलवा, जलेबी और रबड़ी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। भोजन के बाद पान खाना भी यहां की परंपरा में शुमार है।

राजस्थानी वेशभूषा राजस्थान के लोगों का पहनावा रंग-रगीला है। रेत और पहाड़ियों के सुस्त रंगों के बीच चमकीले रंगों की पोशाक राजस्थान के लोगों को जीवंत बनाती है। सिर से लेकर पांव तक, पगड़ी, कपड़े, गहने और यहां तक कि जूते भी राजस्थान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं। सदियों बीत जाने के बाद भी यहां की वेशभूषा अपनी पहचान बनाये हुए है।

राजस्थान की जीवन शैली के आधार पर अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग परिधान के अंतर्गत पगड़ी यहां के लोगों की शान और मान का प्रतीक है। यहां के लोग 1000 से भी अधिक प्रकार से पगड़ी बांधते हैं। कहा जाता है कि यहां हर 1 किमी. से पगड़ी बांधने का तरीका बदल जाता है। पुरुष पोशाक में पगड़ी, अंगरखा, धोती या पजामा, कमरबंद या पटका शामिल है और महिलाओं की पोशाक में घाघरा, जिसे लंबी स्कर्ट भी कहते हैं, कुर्ती या चोली और ओढ़नी शामिल हैं। घाघरे की लंबाई थोड़ी छोटी होती है ताकि पांव में पहने गहने दिखायी दे सकें और ओढ़नी घूंघट करने के काम आती है।

ऊंट, बकरी और भेड़ की खाल से बने जूते पुरुष और महिलाओं के जरिये पहने जाते हैं। मखमल या जरी के ऊपर कढ़ाई कर के जूते के बाहरी भाग पर चिपकाया जाता है। जैसलमेर, जोधपुर, रामजीपुरा और जयपुर की जूतियां पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

राजस्थानी पहनावा :

राजस्थान की पोशाकें भी यहां की प्रकृति, मौसम, जलवायु और पारिस्थितिकी से प्रेरित होती हैं। राजस्थानी पोशाकें बहुउपयोगी भी होती हैं। आइये, राजस्थानी पोशाकों के वैज्ञानिक धरातल को खोजने का प्रयास करें।


राजस्थान में पुरूष सिर पर साफा बांधते रहे हैं। साफा सिर्फ एक पहनावा नहीं है। राजस्थान में नौ माह लगभग गर्मी पड़ती है और तीन माह तेज गर्मी पड़ती है। ऐसे में साफे की कई परतें सिर को लू के थपेड़ों और तेज धूप से बचाती हैं। राजस्थान वीरों की भूमि भी रही है। यदा कदा यहां भूमि और आन के युद्ध से भी गुजरना पड़ता था। ऐसे में आपात प्रहार से बचने में भी साफा ’हेलमेट’ का काम किया करता था। इसके अलावा साफा कूएं से पानी निकालने की रस्सी, तौलिया, चादर, छलनी, अस्त्र, सामान रखने की गठरी आदि कई रूपों में काम आता था।

कुर्ता धोती

राजस्थानी कुर्ता धोती यहां तप्त वातावरण में अनुकूल पोशाकों के काम करते हैं। कुर्ता धोती प्राय: सफेद रंग के होते हैं। सफेद रंग गर्मी को ऑब्जर्व नहीं करता और ठंडक बनाए रखता है। यही कारण है यहां सफेद धोती कुरता का प्रयोग गर्मी से शरीर को बचाने के लिए किया जाता रहा। साथ ही सूती और खुले खुले होने के कारण कुर्ता धोती पहनने वाले को विशेष आराम भी दिया करते थे। वैज्ञानिक तौर पर यहां की जलवायु में कुर्ता धोती से बेहतर कोई पोशाक नहीं है।


राजस्थान में जूतियां पहने का प्रचलन रहा। जूतियां मुख्यत: ऊंट की खाल से बनाई जाती थी। ये जूतियां जहां पहनने में आसान होती थी वहीं शरीर के लिए भी ये नुकसानदेह नहीं होती थी। जूतियां पैरों की शेप को सही रखने के साथ साथ सर्दी और गर्मी में पैरों को विशेष आराम दिया करती थी। सर्दियों में जूतियां गर्म और गर्मियों में ठंडी रहा करती थी। राजस्थान के लोग बरसात के मौसम में जूतियां नहीं पहनते थे। इससे चर्मरोग का खतरा रहता था और जूतियां खराब होने का डर भी।


राजस्थान की महिलाएं घाघरा चोली पहना करती थी। आज भी ग्रामीण इलाकों में घाघरा चोली पहनी जाती है। राजस्थानी महिलाएं आरंभ से ही बहुत कर्मशील रही हैं। ऐसे में घाघरा चोली बहुत जल्द पहना जा सकता है। साड़ी की तरह इसे पहनने में न असुविधा होती है और न ही ज्यादा समय खराब होता है। इसके साथ ही राजस्थानी महिला हमेशा कर्मशील रही है। वह घर, खेत और आजीविका जुटाने में पुरुषों का भरपूर साथ देती है। घाघरा चोली गर्मी के वातावरण में शरीर को स्वस्थ भी रखते हैं और महिलाओं की कर्मशीलता के साथी भी बनते हैं।


राजस्थानी ओढनी राजस्थान की परंपराओं का प्रतीक है। ओढनी न केवल महिलाओं द्वारा सिर पर ओढा जाने वाला एक वस्त्र है बल्कि यह राजस्थानी महिला के मान का प्रतीक भी है। विभिन्न त्योंहारों उत्सवों और शादी विवाह के अवसरों पर कोई भी कार्य ओढनी के बिना नहीं किया जाता। तात्पर्य यह है कि महिलाएं घाघरा चोली पहन कर चाहे पुरुषों के साथ कितना ही कार्य करें, उनपर ओढनी

प्राकृतिक खूबसूरती से भरपूर है महाराष्ट्र…

अगर आपकी भी तमन्ना है सारी दुनिया की सैर करने की तो हम आपको हर खूबसूरत जगह के बारे में बताएगें बस आप हमारे लेख को पढ़ते जाए और आपने शौक को पूरा करते जाए। भारत के पश्चिम की खूबसूरती को और घुमने का शौक भी रखते है तो महाराष्ट्र से और अच्छा क्या होगा। महाराष्ट्र की यात्रा किसी भी सैलानी को भारत के पश्चिमी भाग की खूबसूरती को जानने का मौका देती है।

“देश-गाँव-शहरों-कस्बों से अनुभव का हर पृष्ठ भरूँ….

दिल में यही तमन्ना है सारी दुनिया की सैर करूँ!!!

अगर आपकी भी तमन्ना है सारी दुनिया की सैर करने की तो हम आपको हर खूबसूरत जगह के बारे में बताएगें बस आप हमारे लेख को पढ़ते जाए और आपने शौक को पूरा करते जाए। भारत के पश्चिम की खूबसूरती को और घुमने का शौक भी रखते है तो महाराष्ट्र से और अच्छा क्या होगा। महाराष्ट्र की यात्रा किसी भी सैलानी को भारत के पश्चिमी भाग की खूबसूरती को जानने का मौका देती है।

महाराष्ट्र भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जिसमें मुख्य रुप से दो भू-आकृतियां हैं और इनमें प्राकृतिक सुंदरता के तौर पर बहुत कुछ पेश करने को है। कोंकण की तटीय पट्टी और डेक्कन पठार, ये दो ऐसी प्रकार की ज़मीनें हैं जो इस क्षेत्र में कई सुंदर जगहें बनाती हैं। इस राज्य की सीमा आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, गोवा और कर्नाटक से लगी हुई है। इससे सैलानियों के लिए महाराष्ट्र और उसके आसपास घूमने के लिए कई जगहों के विकल्प मौजूद हैं। अपने सभी आकर्षणों के साथ महाराष्ट्र का एक ऐसा आभा मंडल है जिसे अनदेखा करना मुश्किल है।

इस राज्य का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है और इस क्षेत्र के कब्जे को लेकर कई बार बड़ी लड़ाईयां लड़ी गईं हैं और बहुत खून बहा है। मुगलों की हमेशा से इस क्षेत्र पर कब्जे की ख्वाहिश रही पर वो शायद ही सफल हो पाए। पहले मराठा शासक शिवाजी हमेशा से ही एक महान व्यक्तित्व रहे और इस बहादुर योद्धा जाति के अगुवा भी रहे। शिवाजी ने ब्रिटिशों की रातों की नींद बहुत उड़ाई।

इसकी व्यापार समर्थक छवि और बॉलीवुड की प्रसिद्धि अक्सर महाराष्ट्र के पर्यटन आकर्षणों पर भारी पड़ती है। लेकिन महाराष्ट्र में पर्यटन आकर्षणों का बहुत बड़ा खज़ाना है जिसके लिए लोग इस राज्य का दौरा करते हैं।

राज्य में अजंता और एलोरा में दो विश्व विरासत स्थल हैं जो हमेशा से पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। अगर आप तीन हज़ार साल पहले धर्म और इंसानी कल्पना को चित्रों और मूर्तियों के रुप में उकेरा हुआ देखना चाहते हैं तो अजंता की यात्रा करनी तो बनती है न।

महाराष्ट्र राज्य भारत के पश्चिमी भाग में है और भारत का एक महत्वपूर्ण औद्योगिक राज्य भी है। राज्य में कई मशहूर पर्यटन स्थल हैं और ट्रांसपोर्ट का शानदार नेटवर्क महाराष्ट्र में पर्यटन के विकास को और बढ़ाता है। आब सवाल ये भी है कि महाराष्ट्र कैसे पहुंच सकते है ? तो आपको मदद करेगा यह जानने में कि आप राज्य में हवाई मार्ग, सड़क और रेल से आसानी से कैसे पहुंचें। इस राज्य की भौगोलिक स्थिति सामरिक तौर बहुत महत्वपूर्ण है और राज्य में हवाई, सड़क, रेल और समुद्री संचार व्यवस्था है। इसके आधुनिक संचार ने इस राज्य को देश में उभरने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अगर आप हवाई मार्ग से जाते है तो आपको बता दें कि राज्य की राजधानी मुंबई में दो हवाई अड्डे हैं, एक छत्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा और दूसरा सांता क्रूज घरेलू हवाई अड्डा। सभी निजी और सरकारी एयरलाइंस जैसे एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस, स्पाइस जेट, एयर डेक्कन नियमित तौर पर मुंबई से उड़ानें संचालित करती हैं।

वहीं अगर आप रेल से जाए तो मुंबई में राज्य का सबसे प्रमुख रेलवे स्टेशन है। बड़ी संख्या में महत्पूर्ण रेलें इस शहर को देश के अन्य शहरों और राज्यों से जोड़ती हैं। यहां के पर्यटन स्थलों में या उनके आसपास भी कई प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं।

अब अगर आप सड़क के रास्ते जाए तो राष्ट्रीय राजमार्ग 17 और राष्ट्रीय राजमार्ग 6 महाराष्ट्र को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ते हैं। राज्य का सड़क नेटवर्क बहुत बेहतरीन है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय राजमार्ग और राज्य राजमार्ग हैं जो पूरे राज्य में फैले हैं और महाराष्ट्र के किसी भी शहर से देश के किसी भी हिस्से में पहुंचने में मदद करते हैं। महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम कई बसें चलाता है जो सभी शहरों को देश भर से जोड़ती हैं।

महाराष्ट्र में शॉपिंग

अब कहीं धूमने जाए और खरीदारी न करें तो कुछ अधूरा सा लगता है तो जहीर सी बात है आप शॉपिंग भी करेंगे। तो हम आपको ये भी बता दें कि महाराष्ट्र में खरीददारी के लिए मुंबई सबसे अच्छी जगह है। भारत में खरीददारी के शौकीनों के लिए यह जगह सबसे उपयुक्त है क्योंकि यहां आप को सब कुछ मिलेगा। हालांकि आप इस राज्य की दूसरी जगहों पर भी खरीददारी कर सकते हैं, जैसे औरंगाबाद। महाराष्ट्र क्षेत्र में हस्तशिल्पों की एक समृद्ध विरासत है इसलिए यहां खरीददारी का अपना मज़ा है। अगर आप कपड़ों के शौकीन हैं तो कुछ खास वैराइटी के लिए महाराष्ट्र एक आदर्श स्थान है। खासकर औरंगाबाद क्षेत्र अपने 2000 साल पुराने पैठनी साड़ी की बुनाई के लिए मशहूर है। क्योंकि मुंबई राजधानी है और भारत का एक महानगर भी है इसलिए आपको यहां दूसरे क्षेत्रों की खासियतें भी मिल जाएंगीं।

आपको लगभग पूरे राज्य में कहीं भी निजी दुकानें और सरकारी एंपोरियम मिल जाएंगे। मुंबई जैसे शहरों में पॉश शापिंग मॉल और डिपार्टमेंटल स्टोर बड़ी संख्या में हैं। आप अच्छे दामों पर केजुअल कपड़े एमजी रोड के ‘फैशन स्ट्रीट’ से खरीद सकते हैं।

पर्यटन स्थलों पर आपको कई निजी दुकानें भी मिल जाएंगी। यदि आप कुछ मेहनत करें तो लोकल कारीगरों के कारखानों पर भी जा सकते हैं, जैसे पैठनी साड़ी और हिमरु साड़ी के कारखानों पर।

महाराष्ट्र में देखने के लिए

शिर्डी यात्रा, खंडाला यात्रा, माथेरान यात्रा, मुंबई यात्रा, नागपुर यात्रा, पंचगनी यात्रा, महाबलेश्वर यात्रा, लोनावला यात्रा, पुणे यात्रा, अजंता यात्रा, एलोरा यात्रा। महाराष्ट्र में किले, महाराष्ट्र में गुफाएं, महाराष्ट्र में समुद्र तट, महाराष्ट्र में हिल स्टेशन, महाराष्ट्र में मंदिर, महाराष्ट्र में संग्रहालय, महाराष्ट्र में ज्योतिर्लिंग, मनोरंजन स्थल, महाराष्ट्र में झीलें और नदियां। तो आइए जानते है इनके बारे में….


मुंबई महाराष्ट्र का राजधानी शहर है। यह शहर लोगों के सपने पूरे करने के लिए जाना जाता है और यही कारण है कि लोग इसे ‘ड्रीम सिटी ऑफ इंडिया’ भी कहते हैं। मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी भी है। यहां देखने लायक जगहों में गेटवे ऑफ इंडिया, हैंगिंग गार्डन, महालक्ष्मी मंदिर, हाजी अली दरगाह, मरीन ड्राइव, जुहू बीच और चैपाटी शामिल हैं। मुंबई शहर बॉलीवुड का गढ़ भी है। नए बने बांद्रा-वर्ली सी लिंक पर रात में ड्राइव आपको लंबे समय तक याद रहेगी।

एस्सेल वल्र्ड देश में बच्चों द्वारा सबसे ज्यादा देखी जाने वाली जगह है। यहां के प्रवेश के लिए टिकट बच्चों और बड़ों के लिए अलग अलग दाम के हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए टिकट पर छूट भी है। वीकडे पर आपको टिकट 300-500 रुपये के बीच मिल सकता है और सप्ताहांत में इसके दाम दोगुने भी हो सकते हैं।

एलीफेंटा गुफाएं

मुंबई तट से सिर्फ 10 किलोमीटर दूर अरब सागर के बीच एक द्वीप पर यह गुफाएं स्थित हैं। यह गुफाएं 450 से 750 ईस्वी पुरानी हैं इनमें भगवान शिव की महिमा का चित्रण करती कई प्रतिमाएं हैं। गेटवे ऑफ इंडिया से इस द्वीप के लिए जेटी से नियमित मोटरबोट चलती है। इन गुफाओं को यूनेस्को ने विश्व विरासत घोषित कर रखा है।


औरंगाबाद शहर अजंता और एलोरा के विरासत स्थलों के लिए मशहूर है। 29 चट्टानों के समूह को काट कर बने ये गुफा पर्वत इस देश में वास्तुकला की उपलब्धियों का प्रतीक हैं। अजंता के भित्ति चित्र और एलोरा की मूर्तियां और इस जगह की खूबसूरती आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। इस शहर का नाम मुगल बादशाह औरंगजेब के नाम पर रखा गया है जिन्होंने डेक्कन पर राज करने के लिए इसे वाइसरिगल राजधानी बनाया। बादशाह ने यहां अपनी मां को श्रद्धांजलि देने के लिए बीबी का मकबरा बनवाया। यह मकबरा मशहूर ताज महल की नकल है। पनचक्की और दरवाज़े यहां बीते दिनों की शानदार वास्तुकला के उदाहरण के तौर पर मौजूद हैं।


गणपतिपुले महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव है जिसमें खूबसूरत लंबे समुद्र तट हैं। गणपतिपुले नाम का तट इनमें सबसे सुंदर बीच है। सुनहरी धूप से सजे तट और हरियाली आपको गणपतिपुले की शानदार धरती से प्यार करने को मजबूर कर देंगे। यहां पर पानी के खेल की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा तट पर भगवान गणपति का मंदिर भी है।

महाबलेश्वर, लोनावाला और खंडाला

ज्यादातर लोगों ने अगर वास्तविकता में नहीं तो टीवी पर ही सही, लेकिन महाराष्ट्र के हिल स्टेशनों की खूबसूरती देखी है। शुक्र है बाॅलीवुड और आमिर खान का कि मशहूर गाने के जरिये उन्होंने हर भारतीय के मन में खंडाला को बसा दिया। महाबलेश्वर अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है और हनीमून के लिए भी यह जगह बहुत मशहूर है। यहां की साफ हवा, शांत वातावरण, सुंदर और शांत झील और शानदार झरने आपको शहर की हलचल से दूर आनंद की अनुभूति देते हैं।


पांच पहाड़ों से घिरा पंचगनी धरती पर एक स्वर्ग है। यह जगह बहुत सुंदर है और आसपास का वातावरण बहुत शांत है। सैलानियों के बीच यह हिल स्टेशन बहुत मशहूर है। पंचगनी में आपको कई अमीर और मशहूर व्यक्तियों के फार्म हाउस मिल जाएंगे।

पेंच राष्ट्रीय उद्यान

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के निचले दक्षिणी इलाके में 257 वर्ग किलोमीटर में फैले इस पार्क में विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीवों को देखने का शानदार मौका मिलता है। पेंच में देखे जा सकने वाले वन्य जीवों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, बार्किंग डियर, नीलगाय, ब्लेक बक, गौर, जंगली भालू, चैसिंघा, स्लोथ बीयर, लंगूर, बंदर, माउस डियर, हाइना और गिलहरी आदि हैं।


महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में शिर्डी शहर स्थित है। पूरी दुनिया से लोग श्री सांई बाबा की समाधि पर बने शिर्डी सांई मंदिर को देखने आते हैं। इस मंदिर के अलावा शनि मंदिर, नरसिंह मंदिर, कंडोबा मंदिर, साकोरी आश्रम और चांगदेव महाराज समाधि भी देखे जा सकते हैं।

पूणे झील

‘डेक्कन की रानी’ और ‘पूरब के ऑक्सफोर्ड’ के नाम से मशहूर महाराष्ट्र का पुणे शहर इसके समृद्ध ऐतिहासिक अतीत और आधुनिक चमकदार आकर्षण के लिए देखने लायक शहर है। पुणे के हरे भरे पर्वत और खूबसूरत झीलें यहां आने वाले सैलानियों के लिए यादगार रहती हैं।

महाराष्ट्र के आसपास पर्यटन स्थल

महाराष्ट्र राज्य पश्चिम में गुजरात, पूर्वोत्तर में मध्य प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में कर्नाटक से घिरा है। यदि आपके पास समय हो तो इन सब जगहों की भी यात्रा जरुर करें। गुजरात राज्य में कई मंदिर और किले हैं और सैलानियों को अपनी ओर खींचते हैं। इनमें भावनगर का पालिताना मंदिर, अक्षरधाम मंदिर, सूर्य मंदिर और अन्य कई हैं। गुजरात का गिर जंगल भी विभिन्न प्रजाति के संरक्षित जानवरों के लिए मशहूर है।

आंध्र प्रदेश में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर दुनिया में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला मंदिर है। जोग वॉटरफॉल, बनेर्घट्टा और बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान और होयसला मंदिर कर्नाटक राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। हालांकि इन राज्यों में इन सब स्थानों के अलावा भी कई जगहें हैं जो इन राज्यों की मूल यात्रा करने पर आप देख पाएंगे।

लोकप्रिय स्थलों पर समुद्री विमान सेवा

एक अनोखी समुद्री विमान सेवा मेरीटाईम हैली एयर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और महाराष्ट्र के पर्यटन विभाग ने शुरु की है जिसमें राज्य के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल मुंबई के जुहू से जुड़ जाएंगे। जुहू और एम्बी वैली के बीच हवाई चार्टर सेवा 24 फरवरी 2014 को शुरु हुई थी। चार सीटों वाला सेसना 206 समुद्री विमान इस मार्ग पर इस सेवा के लिए तैनात किया गया है। इस यात्रा की लागत 4000-4500 रुपये के बीच आती है। हालांकि नरीमन पाईंट के लिए इस सेवा का खर्च 750 रुपये है।

इस फर्म और महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम ने पोर्ट ब्लेअर के बाद मुंबई को दूसरा ऐसा शहर बनाया है जिसमें यह समुद्री विमान सेवा चलाई गई है। पोर्ट ब्लेअर में यह सेवा जनवरी 2011 को शुरु की गई थी। परिवहन का यह नया रुप जुहू को लवासा, एम्बी वैली, नाशिक, पंचगनी और लोनावला से जोड़ेगा। यात्रा का समय बचाने में यह बहुत मददगार सेवा है। जुहू से इस सेवा के ज़रिए कहीं भी जाने में आधे घंटे का ही समय लगेगा। आशा है कि इस प्रोजेक्ट की वजह से और भी सैलानी इस ओर आकर्षित होंगे क्योंकि यह बहुत सुविधाजनक विकल्प है।

Explore Rashtrapati Bhavan

On the opposite of the Rajpath is residence of the President of India. Not among the typical tourist places in Delhi, access to this grand piece of architecture is restricted.

With four floors and 340 rooms in a floor area of 200,000 square feet, it has a huge presidential gardens (Mughal Gardens), large open spaces, residences of bodyguards and staff, stables, other offices and utilities within its perimeter walls.

This grand architectural building is the largest residence of any head of state around the world. The architectural design of the building is based on the design of the Edwardian Baroque. The middle dome of the building is the perfect amalgamation of the Indian and the British architectural styles. Just a walk past the monument will give you an idea of how grand the monument is.

Opening hours: 9 am till late evening. For an inside visit, one can pre book at the official Rashtrapati Bhawan website.

Must visit: Stroll through the road and you will get a glimpse of Parliament House, National Secretariat and Defence Headquarters

Tip: Entry is restricted to only those who obtain a permit in advance.

India issue travel advisory for people travelling to Hong Kong

India on Tuesday issued an advisory to its citizens for travelling to Hong Kong, a day after flight operations were severely disrupted at the city’s international airport due to public demonstrations on August 12.

The Ministry of External Affairs, in a statement, said, “While operations are likely to resume on August 13, however, flights are likely to continue to be delayed and/or cancelled as it is possible that more protests may be held.”
“Indian passengers are advised to be in touch with airlines to find alternative travel routes to avoid inconvenience, till normalcy is restored in airport operations,” the statement read.

The Ministry further advised all Indian passengers, who are already in Hong Kong and waiting to depart, to “be in touch with their respective airlines for information about likely timelines for the resumption of their flights”.

“Consulate can be reached at our helpline at +852 90771083,” the statement added.

Hong Kong airport authority, within a short notice on Monday, suspended all remaining flights for the day after thousands of pro-democracy protesters entered the terminal’s arrival halls.

The airport was reopened on Tuesday, however, hundreds of flights were still listed as cancelled.

All stranded passengers were seen lining up to catch their delayed flights, as airport authorities announced that it will implement rescheduling while blaming demonstrators for the chaos.


राजपूताने की शान- कुम्भलगढ़ का किला

आपने विश्व की सबसे लम्बी दीवार “द ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना” के बारे में तो सुना ही होगा पर क्या आपने विश्व कि दूसरी सबसे लम्बी दीवार के बारे में सुना है, देखा है या पढ़ा है जो कि हमारे भारत में ही स्थित है? अगर नहीं तो आइए हम आपको बताते है…..

आपने विश्व की सबसे लम्बी दीवार “द ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना”  के बारे में तो सुना ही होगा पर क्या आपने विश्व कि दूसरी सबसे लम्बी दीवार के बारे में सुना है, देखा है या पढ़ा है जो कि हमारे भारत में ही स्थित है? अगर नहीं तो आइए हम आपको बताते है…..

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित कुम्भलगढ़ किला है। कुम्भलगढ़, राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित एक विख्यात पर्यटन स्थल है। यह स्थान राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित है और कुम्भलमेर के नाम से भी जाना जाता है। कुम्भलगढ़ किला राजस्थान राज्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण किला है जिसकी दीवार 36 किलोमीटर लम्बी  तथा 15 फीट चौड़ी है।  इस  किले का निर्माण महाराणा कुम्भा ने 15वीं सदी में करवाया था। यह दुर्ग समुद्रतल से करीब  1100 मीटर कि ऊंचाईं पर स्थित है। इसका निर्माण सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र सम्प्रति के बनाए दुर्ग के अवशेषो पर किया गया था। इस दुर्ग को पूरा बनने में 15 साल (1443-1458) लगे थे। दुर्ग का निर्माण पूरा होने पर महाराणा कुम्भ ने सिक्के बनवाए थे जिन पर दुर्ग और इसका नाम अंकित था।

पर्यटक किले के ऊपर से आस पास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह एक सबसे लम्बी दीवार है। दुर्ग कई घाटियों व पहाड़ियों को मिला कर बनाया गया है जिससे यह प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार पाकर अजेय रहा। इस दुर्ग में ऊँचे स्थानों पर महल,मंदिर व आवासीय इमारतें बनाई गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया वही ढलान वाले भागों का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वाबलंबी बनाया गया।

दुर्ग के अंदर मंदिर

इस दुर्ग के अंदर 360 से ज्यादा मंदिर हैं जिनमे से 300 प्राचीन जैन मंदिर तथा बाकि हिन्दू मंदिर हैं। इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है। इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था। हल्दी घाटी के युद्ध में हार के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे।

दुर्ग की कहानी

इसके निर्माण कि कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।  1443 में  राणा कुम्भा ने इसका निर्माण शुरू करवाया पर निर्माण कार्य  आगे नहीं बढ़ पाया, निर्माण कार्य में बहुत अड़चने आने लगी। राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया। संत ने बताया यह काम  तभी आगे बढ़ेगा  जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करें। राजा इस बात से चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर कौन इसके लिए आगे आएगा। तभी संत ने कहा कि वह खुद बलिदान के लिए तैयार है और इसके लिए राजा से आज्ञा मांगी। संत ने कहा कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उसे मार दिया जाए और वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए। ठिक ऐसा ही हुआ और वह 36 किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। जहां पर उसका सिर गिरा वहां मुख्य द्वार “हनुमान पोल” है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है।

महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 किले आते थे जिसमें से 32 किलों का नक्शा उसके द्वारा बनवाया गया था। कुंभलगढ़ भी उनमें से एक है। इस किले की दीवार की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि 10 घोड़े एक ही समय में उसपर दौड़ सकते हैं। एक मान्यता यह भी है कि महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के  लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करते थे जिनसे बड़े बड़े लेम्प जला कर प्रकाश किया जाता था।

इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय: अजेय ही रहा है। उस बार भी दुर्ग में पीने का पानी खत्म हो गया था और दुर्ग को बहार से चार राजाओं कि संयुक्त सेना ने घेर रखा था यह थे मुग़ल शासक अकबर, आमेर के राजा मान सिंह, मेवार के राजा उदय सिंह और गुजरात के सुल्तान। लेकिन इस दुर्ग की कई दुखांत घटनाएं भी है जिस महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका वही परमवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने पुत्र उदय कर्ण द्वारा राज्य लिप्सा में मारे गए।

बादलों का महल

राजस्थान के अन्य स्थलों की तरह, कुम्भलगढ़ भी अपने शानदार महलों के लिए प्रसिद्ध है जिसमें बादल महल भी शामिल है । यह ईमारत ‘बादलों के महल’ के नाम से भी जानी जाती है। मर्दाना महल और जनाना महल इस महल के आपस में जुड़े हुए दो भाग हैं। इस महल के शानदार कमरे पेस्टल रंगों से निर्मित भित्ति चित्रों से सुसज्जित हैं। इनके मंडप अद्वितीय वातानुकूलन पद्धति के लिए विख्यात हैं।

कुम्भलगढ़ में पर्यटक स्थलों का भ्रमण

कुम्भलगढ़ अपने शानदार महलों के अतिरिक्त कई प्राचीन मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। उनमें से वेदी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, मुच्छल महादेव मंदिर, परशुराम मंदिर, मम्मादेव मंदिर और रणकपुर जैन मंदिर इस पर्यटन स्थल के मुख्य पवित्र स्थल हैं।

कुम्भलगढ़ अभ्यारण्य, चार सींगों वाले हिरन या चौसिंघा, काला तेंदुआ,जंगली सूअर, भेड़ियों, भालू, सियार, सांभर हिरन, चिंकारा, तेंदुओं, लकड़बघ्घों, जंगली बिल्ली, नीलगाय और खरगोश देखने के लिए आदर्श स्थल है। राज्य में केवल इस अभ्यारण्य में ही पर्यटक भेड़ियों को देख सकते हैं। हल्दीघाटी और घणेरो कुम्भलगढ़ के पर्यटन के लिए अन्य प्रसिद्ध आकर्षण हैं।

किस मौसम में जाएं कुम्भलगढ़

कुम्भलगढ़ में साल भर मौसम सामान्य रहता है। हालाँकि कुम्भलगढ़ में अक्टूबर से लेकर मार्च के बीच का सुहाना मौसम पर्यटन के लिए आदर्श समय है। इस समय के दौरान आने वाले पर्यटक कुम्भलगढ़ में पर्यटन स्थलों के भ्रमण का एवं वन्य जीवन का आनंद उठा सकते हैं।

कुम्भलगढ़ की कुछ औऱ खास बातें

– कुम्भलगढ़ किले को देश का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता है जिसे आज तक सीधे युद्ध में जीतना नामुमकिन है। गुजरात के अहमद शाह से लेकर महमूद ख़िलजी सभी ने आक्रमण किया लेकिन कोई भी युद्ध में इसे जीत नही सका।

– यह चित्तौरगढ़ के बाद सबसे बड़ा दुर्ग है।

– इसकी परकोटे की दीवार लंबाई में दुनिया में चीन की दीवार के बाद दुसरे स्थान पर है। इसकी लंबाई 38 किलोमीटर है और इसे भारत की महान दिवार भी कहा जाता है।

– कुम्भलगढ़ के निर्माण के वक्त आने वाली बाधाओ को दूर करने के लिये सबसे पहले इस स्थान पर एक राजपूत योद्धा की स्वेछिक नर बलि दी गई थी।

– कुम्भलगढ़ मेवाड़ के महाराणाओं की शरणस्थली रहा है। विपत्तिकाल में हमेशा महाराणाओं ने इस दुर्ग में शरण ली है। यही पर महाराणा उदय सिंह को छिपाकर सुरक्षित रखा गया और उनका पालन हुआ।

– इसी दुर्ग में हिंदुआ सूर्य महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। उस कमरे को आज भी देखा जा सकता है।

– महाराणा कुंभा हर रात को दुर्ग के निचे वादियों में काम करने वाले किसानो के लिये 50 किलो घी और 100 किलो रुई के इस्तमाल से जलने वाले दियो से रोशनी करवाते थे।

– कुम्भलगढ़ किले को हाल ही में चित्तोड़, गागरोन, जैसलमेर, आम्बेर और रणथम्भोर के साथ यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साईट के रूप में मान्यता मिली है और इन्हें राजपूत पहाड़ी दुर्ग कला का अद्वितीय नमूना माना गया है।

– कुम्भलगढ़ किला 1100 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना है और इसकी दीवारे 14 फ़ीट मोटी हैँ और इसके 7 मुख्य दरवाजे हैँ।

– इस दुर्ग में 360 जैन और सनातनी मन्दिर हैँ जिनमें कई अब भी अच्छी हालत में हैँ।

– कुम्भलगढ़ से एक तरफ सैकड़ो किलोमीटर में फैले अरावली पर्वत श्रृंखला की हरियाली दिखाई देती हैँ जिनसे वो घिरा हैँ, वहीं दूसरी तरफ थार रेगिस्तान के रेत के टीले भी दिखते हैँ।

– हर साल यहाँ राजस्थान सरकार द्वारा 3 दिन का उत्सव मनाया जाता है जिसमे महाराणा कुंभा के स्थापत्य और कला में योगदान को याद किया जाता है।