Ze-haal-e-miskin makun taghaful durae nainan banae batiyan

AMEER KHUSRAU

ze-hāl-e-miskīñ makun taġhāful durā.e naināñ banā.e batiyāñ
ki tāb-e-hijrāñ nadāram ai jaañ na lehū kaahe lagā.e chhatiyāñ

shabān-e-hijrāñ darāz chuuñ zulf o roz-e-vaslat chuuñ umr-e-kotāh
sakhī piyā ko jo maiñ na dekhūñ to kaise kāTūñ añdherī ratiyāñ

yakāyak az dil do chashm jaadū ba-sad-farebam ba-burd taskīñ
kise paḌī hai jo jā sunāve piyāre pī ko hamārī batiyāñ

chuuñ sham-e-sozāñ chuuñ zarra hairāñ z mehr-e-āñ-mah bagashtam āḳhir
na niiñd naināñ na añg chaināñ na aap aave na bheje patiyāñ

ba-haqq-e-āñ mah ki roz-e-mahshar ba-dād maarā fareb ‘ḳhusrav’
sapīt man ke durā.e rākhūñ jo jaa.e pā.ūñ piyā kī khatiyāñ

rekhta

Suna suna dil ka mujhe nagar lagta hai

suunā suunā dil kā mujhe nagar lagtā hai
apne saa.e se bhī aaj to Dar lagtā hai

baañT rahā hai dāman dāman merī chāhat
apnā dil bhī kisī saḳhī kā dar lagtā hai

mahrūmī ne jahāñ baserā DhūñD liyā hai
mujh ko to vo ghar bhī apnā ghar lagtā hai

merī barbādī meñ hissa hai apnoñ kā
mumkin hai ye baat ġhalat ho par lagtā hai

‘josh’ huuñ maiñ dīvane-pan kī us manzil meñ
jahāñ raqīb bhī apnā nāma-bar lagtā hai

रूहानी मिलन की बात…!

राजू उपाध्याय

ध्वंस में थोड़े सृजन की, बात होनी चाहिये।
तमस में नन्हीं किरन की,बात होनी चाहिये।

यदि सम्वेदना सर्द हों, और औंधी पड़ीं हो,
ऐसे में थोड़ी तपन की, बात होनी चाहिये।

आँसू के दर्दीले बादल,जब नैनो में बसते हों,
फिर तो सुनहरे सपन की,बात होनी चाहिये।

कोई दर्द हद से बढ़े ,एहसास भी मीठा लगे,
तब उपचार में जलन की, बात होनी चाहिये।

प्यास अधरों पर धरी हो इक नदी हो सामने,
इन्ही क्षणों में आचमन की,बात होनी चाहिये।

माना देह से परे है ,प्रेम का पावन फलसफा,
तो फिर रूहानी मिलन की,बात होनी चाहिये।

“मैं मजदूर हूँ”

किस्मत से मजबूर हूँ।
सपनों के आसमान में जीता हूँ,
उम्मीदों के आँगन को सींचता हूँ।
दो वक्त की रोटी खानें के लिये,
अपने स्वभिमान को नहीँ बेचता हूँ।
तन को ढकने के लिये
फटा पुराना लिबास है।
कंधों पर जिम्मेदारीहै
जिसका मुझे अहसास है।
खुला आकाश है छत मेरा
बिछौना मेरा धरती है।
घास-फूस के झोपड़ी में
सिमटी अपनी हस्ती है।
गुजर रहा जीवन अभावों में,
जो दिख रहा प्रत्यक्ष है।
आत्मसंतोष ही मेरे
जीवन का लक्ष्य है।
गरीबी और लाचारी से जूझ
जूझकर हँसना भूल चुका हूँ।
अनगिनत तनावों से लदा हुआ,
आँसू पीकर मजबूत बना हूँ।

धुंआ ख्वाहिशें..

राजू_उपाध्याय

मेरा मीत आज हुआ कुछ,बावला सा है ।
शायद मन कहीं, कुछ छला छला सा है।

उजड़ा जब नशेमन झोंके के इक दम से ,
दिल की बस्ती में उठा ज़लज़ला सा है।

सन्नाटों का शोर है मचल गईं बिजलियां,
मौसम भी देखिये,हुआ वो सांवला सा है।

सिलसिला चाहतों का कहां पर आ थमा ,
मलाल और सवाल भी, दिलजला सा है।

दिल उदास-उदास है ,हुई धुआं ख्वाहिशे,
ये उनकी नई नजर,सावन मनचला सा है।

बूंद आसमां को छोड़ जमीं से आ मिली,
रिश्ता अजब,गोया दिल का मामला सा है।

मोबाइल

ये “मोबाइल”…
यों‌ ही हट्टा कट्टा नहीं हुआ है,
इसने बहुत कुछ खाया पिया है।

मसलन…
ये हाथ की घड़ियां खा गया ये चिट्ठी पत्रियां खा गया
इसने रेडियो खा लिया
टेप रिकॉर्डर, कैसेटें, कैमरे चबा गया
ये टार्च लाइटें खा गया।

ये “मोबाइल” जो है कितना कुछ खा गया
इसने सैकड़ों मिल की दूरियां पी हैं
इस “मोबाइल” ने तन्हाइयां पी हैं…
पड़ोसी की दोस्ती मेल मिलाप खा गया।

ये पैसे खा रहा है
ये रिश्ते खा रहा है…
ये लोगों की तंदूरूस्ती खा रहा है
ये लोगों को रोगी बना रहा है।

ये “मोबाइल PHONE”
यों‌ ही हट्टा कट्टा नहीं हुआ है,
इसने बहुत कुछ खाया पिया है।।

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे___क़ाएम चाँदपुरी

मोहम्मद क़यामुद्दीन ‘क़ाएम’ चाँदपुरी अठारहवीं सदी के मुम्ताज़ शाइ’रों में शामिल हैं। ‘क़ाएम’ चाँदपुरी की पैदाइश तक़रीबन 1725 में क़स्बा चाँदपुर, ज़िला बिजनौर के क़रीब ‘महदूद’ नाम के एक गाँव में हुई थी। लेकिन वो बचपन से दिल्ली में आ रहे और 1755 तक शाही मुलाज़मत के सिलसिले से दिल्ली में ही रहे। दिल्ली की तबाही और हालात की ना-साज़गारी से बद-दिल हो कर दिल्ली से टांडा पहुँचे। जब यहाँ के हालात भी अबतर हो गए तो उन्हें मजबूरन टांडा भी छोड़ना पड़ा। इस तरह उ’म्र भर रोज़गार की तलाश में हैरान-ओ-परेशान वो एक शहर से दूसरे शहर में फिरते रहे। आख़िर 1780 में रामपुर चले गए, जहाँ 1794 में वफ़ात पाई।

क़ाएम ने अपने कलाम पर सब से पहले शाह हिदायत से इस्लाह ली। उसके बाद ख़्वाजा मीर ‘दर्द’ और फिर मोहम्मद रफ़ीअ’ ‘सौदा’ के शागिर्द हुए। शेर ओ शाइरी के फ़न में इतने माहिर हो गए कि ‘मीर’, ‘मिर्ज़ा’ और ‘दर्द’ के बा’द उस ज़माने के बड़े शाइरों में उनका नाम लिया जाने लगा। ब-क़ौल मोहम्मद हुसैन आज़ाद “उनका दीवान हर्गिज़ ‘मीर’-ओ-‘मिर्ज़ा’ के दीवान से नीचे नहीं रख सकते।”

टूटा जो का’बा कौन सी ये जा-ए-ग़म है शेख़
कुछ क़स्र-ए-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा

ग़ैर से मिलना तुम्हारा सुन के गो हम चुप रहे
पर सुना होगा कि तुम को इक जहाँ ने क्या कहा

दर्द-ए-दिल कुछ कहा नहीं जाता
आह चुप भी रहा नहीं जाता

किस बात पर तिरी मैं करूँ ए’तिबार हाए
इक़रार यक तरफ़ है तो इन्कार यक तरफ़

मय की तौबा को तो मुद्दत हुई ‘क़ाएम’ लेकिन
बे-तलब अब भी जो मिल जाए तो इन्कार नहीं

न जाने कौन सी साअ’त चमन से बिछड़े थे
कि आँख भर के न फिर सू-ए-गुल्सिताँ देखा

चाहें हैं ये हम भी कि रहे पाक मोहब्बत
पर जिस में ये दूरी हो वो क्या ख़ाक मोहब्बत

ज़ालिम तू मेरी सादा-दिली पर तो रह्म कर
रूठा था तुझ से आप ही और आप मन गया

Rekhta