Ze-haal-e-miskin makun taghaful durae nainan banae batiyan

AMEER KHUSRAU ze-hāl-e-miskīñ makun taġhāful durā.e naināñ banā.e batiyāñ ki tāb-e-hijrāñ nadāram ai jaañ na lehū kaahe lagā.e chhatiyāñ shabān-e-hijrāñ darāz chuuñ zulf o roz-e-vaslat chuuñ umr-e-kotāh sakhī piyā ko jo maiñ na dekhūñ to kaise kāTūñ añdherī ratiyāñ yakāyak az dil do chashm jaadū ba-sad-farebam ba-burd taskīñ kise paḌī hai jo jā sunāve piyāre…

Suna suna dil ka mujhe nagar lagta hai

suunā suunā dil kā mujhe nagar lagtā hai apne saa.e se bhī aaj to Dar lagtā hai baañT rahā hai dāman dāman merī chāhat apnā dil bhī kisī saḳhī kā dar lagtā hai mahrūmī ne jahāñ baserā DhūñD liyā hai mujh ko to vo ghar bhī apnā ghar lagtā hai merī barbādī meñ hissa hai…

रूहानी मिलन की बात…!

राजू उपाध्याय ध्वंस में थोड़े सृजन की, बात होनी चाहिये। तमस में नन्हीं किरन की,बात होनी चाहिये। यदि सम्वेदना सर्द हों, और औंधी पड़ीं हो, ऐसे में थोड़ी तपन की, बात होनी चाहिये। आँसू के दर्दीले बादल,जब नैनो में बसते हों, फिर तो सुनहरे सपन की,बात होनी चाहिये। कोई दर्द हद से बढ़े ,एहसास भी…

“मैं मजदूर हूँ”

किस्मत से मजबूर हूँ।सपनों के आसमान में जीता हूँ,उम्मीदों के आँगन को सींचता हूँ।दो वक्त की रोटी खानें के लिये,अपने स्वभिमान को नहीँ बेचता हूँ।तन को ढकने के लियेफटा पुराना लिबास है।कंधों पर जिम्मेदारीहैजिसका मुझे अहसास है।खुला आकाश है छत मेराबिछौना मेरा धरती है।घास-फूस के झोपड़ी मेंसिमटी अपनी हस्ती है।गुजर रहा जीवन अभावों में,जो दिख…

धुंआ ख्वाहिशें..

राजू_उपाध्याय मेरा मीत आज हुआ कुछ,बावला सा है । शायद मन कहीं, कुछ छला छला सा है। उजड़ा जब नशेमन झोंके के इक दम से , दिल की बस्ती में उठा ज़लज़ला सा है। सन्नाटों का शोर है मचल गईं बिजलियां, मौसम भी देखिये,हुआ वो सांवला सा है। सिलसिला चाहतों का कहां पर आ थमा…

मोबाइल

ये “मोबाइल”… यों‌ ही हट्टा कट्टा नहीं हुआ है,इसने बहुत कुछ खाया पिया है। मसलन…ये हाथ की घड़ियां खा गया ये चिट्ठी पत्रियां खा गयाइसने रेडियो खा लियाटेप रिकॉर्डर, कैसेटें, कैमरे चबा गयाये टार्च लाइटें खा गया। ये “मोबाइल” जो है कितना कुछ खा गयाइसने सैकड़ों मिल की दूरियां पी हैंइस “मोबाइल” ने तन्हाइयां पी…

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे___क़ाएम चाँदपुरी

मोहम्मद क़यामुद्दीन ‘क़ाएम’ चाँदपुरी अठारहवीं सदी के मुम्ताज़ शाइ’रों में शामिल हैं। ‘क़ाएम’ चाँदपुरी की पैदाइश तक़रीबन 1725 में क़स्बा चाँदपुर, ज़िला बिजनौर के क़रीब ‘महदूद’ नाम के एक गाँव में हुई थी। लेकिन वो बचपन से दिल्ली में आ रहे और 1755 तक शाही मुलाज़मत के सिलसिले से दिल्ली में ही रहे। दिल्ली की तबाही…