जन्म का रिश्ता हैं!

By Kavita Gulati

एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं. वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो.

बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है.

दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है , माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है , तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं.

दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे.

माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है.

हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है , अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी. कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी.

कहानीका सार
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती , माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे.

अंजान राहें !!!!!!

चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर, मिला था हमें कोई प्यारा सा उन्हीं राहों पर…. भटक रहें थे जब हम उन राहों पर, मिला था तभी वो हमें उन राहों पर…. खुश हुए थे हम बहुत उस से यूँ मिल कर, चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर!!!!!!!

चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर, मिला था हमें कोई प्यारा सा उन्हीं राहों पर…. भटक रहें थे जब हम उन राहों पर, मिला था तभी वो हमें उन राहों पर…. खुश हुए थे हम बहुत उस से यूँ मिल कर, चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर!!!!!!!

वो रातें भी अपनी सी लगने लगी थी, उस से यूँ मिलकर लगा कोई था ऐसा जिसकी बातों में हम खो जाते थे…. डूब जाते थे हम उसकी बातों में कुछ इस तरह, चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर!!!!!!

कोई था जो न जाने क्यों अपना सा लगता, कोई था जो बहुत प्यारा सा लगता…. कोई है जिसे हम आज भी याद करते हैं, कोई है जिसे हम आज भी प्यार करते हैं…. पर वो कोई न जाने अब कहाँ है पता नहीं कहाँ खो गया उन अंजान राहों पर!!!!!

नहीं जानते वो कैसा होगा, फिर दुबारा क्यों ये राहें आंजन सी लगती हैं चल रहें थे जब हम अंजान राहों पर!!!!!!

एक अनकहा सा एहसास !!

“न उम्र की सीमा हो, न जन्मों का हो बधंन.. जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन… “प्यार तो ज़िंदगी का सार है, दुनिया में प्यार जैसी खूबसूरत बात ही नहीं, प्यार वो है जो किसी शक्स को ज़िंदगी के बेहद करीब ले आता है।

ज़िंदगी में हमें न जाने ऐसे कितने लोग मिलते है जिनसे एक अनकहा सा connection होता है जिनसे एक राबता सा बन जाता है। न वो हमारे दोस्त होते हैं और न ही वो हमारे खून के रिश्तेदार… न वो, वो होते है जिनसे शायद हम शादी करें, मगर अंदर से उनसे एक जुड़ाव होता है, एक अनकहा एहसास होता है….कभी स्कूल में मिल जाते हैं, कभी बस की साथ वाली सीट पर, कभी रेलवे टिकट की लाइन में शायद, कभी उस ऑफिस में जहां Interview देने गए थे या फिर Client की Meeting के दौरान, या Courier की Delivery के दौरान शायद या वो आपकी दुकान पर कुछ लेने आई थी। उसकी किसी बात में उसकी मुस्कान में पता नहीं किसमें पर एक बहुत गहरा सा जुड़ाव महसूस होता है।

पता है क्या होता है अंदर से एक तार सा हिल जाता है कुछ जुड़ा-जुड़ा सा महसूस होता है। वो बहुत अच्छा लगता है इतना अच्छा की वक्त उसके साथ बह जाता है और उसके बिना ठहर जाता है, मगर ये सब होने के बावजूद हम उससे कुछ भी कहने से कतराते हैं, उसे ये बताने से खिद को रोकते हैं कि क्यों इतना अच्छा लगता है, पता है क्यों?? क्योंकि सवालों का एक पहाड़ हमारे सामने खड़ा होता है जिनका जवाब ढुड़ते-ढुड़ते एक जीवन भी कम पड़ जाए….तुम उसके लगते क्या हो..??क्या रिश्ता है तुम दोनों के बीच..??क्या उम्र का लिहाज भी नहीं रखा..??जानते तो हो वो एक अलग मजहब की है..??घर पर क्या बताओगे..??शादी तो हो गई फिर अब ये कैसे हो सकता है..??लोग पूछेगें तो उनसे क्या कहोगे..?? इज्जत निलाम नहीं हो जाएगी तुम्हारी..??इतने सवाल… इतने सवाल… इतने सवाल…. सिर्फ एक एहसास के लिए… प्यार का एहसास… इतना खूबसूरत एहसास… जिसमें न जन्म का बंधन होता है, न उम्र की सीमा जैसे की जगजीत सिंह ने अपनी ग़ज़ल में कहा है… “न उम्र की सीमा हो, न जन्मों का हो बधंन.. जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन… “प्यार तो ज़िंदगी का सार है, दुनिया में प्यार जैसी खूबसूरत बात ही नहीं, प्यार वो है जो किसी शक्स को ज़िंदगी के बेहद करीब ले आता है।

उसे निखारता है इस एहसास पर इतने सारे सवाल, आखिर क्यों??प्यार तो एक उड़ान है, एक ऐसी उड़ान जिसमें हर इंसान कैद होना चाहता है मगर जब वो उड़ान भरने लगता है तो ये ही सवाल उसके पंख काट देते हैं। ज़मीन पर खड़ा वो उस आसमान को तकता रहता है जहां उसे अपने हमपरवाज के साथ मिलना था।

साथ में एक उड़ान भरनी थी मगर हमने उसके पंख काट दिए।कौन लगता है दिलों पर रिश्तों के ताले लोग, समाज, दुनिया यानि हम… कौन कहता है कि पहले इस रिश्ते को एक नाम दो.. लोग, समाज, दुनिया यानि हम… हम ऐसा क्यों करते हैं शायद हम इस एहसास से अभी दूर हैं या फिर हमें हमारा प्यार नहीं मिला, लेकिन ये क्या बात हुई…. हमें ऐसा क्यों लगता है कि अगर हमें प्यार हुआ है तो हमें अंजाम देना जरूरी है.. हिन्दी फिल्म गुमराह के संगीत में भी संगीतकार महेन्द्र कपूर ने कहा है “ वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।” 

उसे ये बताने के लिए कि वो हमे कितना अच्छा लगता है, हमें उससे कुछ वादें करने होगें, उससे शादी करनी होगी… मगर ये कानून किसने बनाए.. लोग, समाज, दुनिया यानि की हम…
किसी के प्यार पर सवाल उठाने से हम किना पाप करते हैं। उसके प्यार के बीच एक कांटा बन जाते हैं। गुलज़ार साहब ने कहा है कि “सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो… प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो!!”

किताबों से दूर होती जा रही युवा पीढ़ी

“किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं… महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं, जो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है।“

किताबों से अच्छा उपहार शायद ही कोई हो सकता है.. किताबों के बिना जीवन जैसे मानों अधूरा है.. किताबों से दोस्ती हो जाए तो बुरी आदतों से भी छुटकारा मिल जाता है। किताबों को दोस्त बना लिया जाए तो हम उनके साथ हर तरह की बात भी शेयर कर पाते हैं। लेकिन आज हम किताबों से दूर होते जा रहे हैं। लगातार बढ़ रही दूरियों के कारण नई पीढ़ी सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों को समझ नहीं पा रही है. लोकमान्य तिलक ने भी कहा था- “मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्योंकि जहां यह रहेंगी वहां स्वयं ही स्वर्ग बन जाएगा”। 
गुलजार साहब ने भी क्या खूब कहा है, “किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं… महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं, जो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है।“ 

एक बार फिर किताबें दोस्त बनना चाहती हैं, एक बार फिर से दोस्ती करना चाहती हैं। शायद फिर से बातें करना चाहती हैं। जिस तरह पंडित नेहरू जी ने कहा था कि किताबों के बगैर मैं दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं। किताबें हमारे अंदर से कभी संस्कारों को समाप्त नहीं होने देती हैं। जब तक आप में जानने की जिज्ञासा है तब तक आप किताबों से दूर नहीं जा सकते। किताबें तब भी आपका साथ नहीं छोड़ती जब सारी दुनिया आपके खिलाफ हो जाती है। 
आज दुःख इस बात का है कि आज हमारी जिदंगी जिस भागमभाग से गुजर रही है उसमें हमारे पास इतना भी समय नहीं है कि हम कुछ समय किताबों के साथ बिता सकें। बच्चा सिर्फ स्कूली किताबों से ही नहीं सीखता बल्कि कोर्स के अलावा दूसरी किताबों से भी बहुत कुछ सीखता है। 

रेलवे स्टेशन पर किताबों के साथ लगी सभी किताबें अश्लील साहित्य से अटी पड़ी है। जहां आप अपने परिवार के साथ खड़े नहीं हो सकते। सेक्स और नकारात्मक गतिविधियों से लिप्त कर ये सब युवाओं को नकारात्मक सोच की और ले जाता है। जिससे हमारे समाज की आने वाली पीढ़ी गलत दिशा की और जाती है। 
आइए, एक बार फिर किताबों को अपनी दोस्त बना कर एक बार फिर उन से कुछ अच्छा सीखे। 

Household items सोच से भी सस्ता मिलेगा यहां

किस को पसंद नहीं होता घर के हर कोने को सजाने का। ज्यादातर महिलाएं घर में हर तरह का सामान रखना पसंद करती है क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड़ जाए। वैसे तो लोकल मार्केट में आपको सभी चाजं मिल जाती हैं। लेकिन आज हम आपको दिल्ली के एक ऐसे मार्केट के बारे बताएगें जहां आपको हाउसहोल्ड यानी घरेलू इस्तेमाल की सारी चाजें बेहद सस्ते दामों पर और किलो के हिसाब से मिल जाती है।

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शायद आप में से बहुत लोग इस बाजार के बारे में जानते भी होगें… जी हां, हम बात कर रहे हैं दिल्ली के सदर बाजार की। सदर बाजार दिल्ली का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट है। आपको सुनकर शायद थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन यहां आपको हाउसहोल्ड के सामान किलो के हिसाब से बहुत ही सस्ते में मिल सकते हैं।

अगर आप भी यहां से हाउसहोल्ड का सामान सस्ते में खरीदना चाहते हैं तो सोमवार से लेकर शनिवार तक सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक कभी भी जा सकते हैं। आइए यहां बिकने वाले सस्ते हाउसहोल्ड आइटम्स में से कुछ के बारे में हम आपको बता देते हैं….

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टूट जाने के डर से आप क्रॉकरी नहीं खरीदते हैं पर आप अपने घर में खूब सारी क्रॉकरी रखना चाहती हैं तो ऐसे में सदर बाजार आपके लिए बेहद मददगार साबित होगा। यहां से आप सस्ते और कई रंगों के साथ अलग-अलग डिजाइन्स की क्रॉकरी खरीद सकती हैं।

इस होलसेल मार्केट सदर में आपको होम डेकॉर आइटम्स भी भरपूर मात्रा में मिलेगें। ये आइटम्स अलग-अलग डिजाइंस के सुंदर व सस्ते में मिल जाएंगे। खूबसूरत सजावटी लड़ियों के साथ-साथ तोरण भी आप खरीद सकती हैं। इन सस्ते सामनों से आप अपने घर को बखूबी सजा सकती हैं। यहां इसकी प्रति पीस कीमत 10 रु तक होती है।

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सदर बाजार में आपको हाउसहोल्ड के सारे आइटम्स मिल सकते हैं जिसमें आपको किचन में यूज करने वाले सामान सबसे ज्यादा दिखाई देगें। यहां आपको सब्जी काटने के चाकू से लेकर, सॉसपैन, कलछी, कढ़ाही, चिमटा, कद्दूकस जैसी तमाम चीजें मिल जाएंगी वो भी किलो के भाव। 

इसी के साथ अगर आपको भी ब्यूटी प्रोडक्स का शोक है तो सदर बाजार में ये सब भी आपको काफी सस्ता मिलेगा। जरूरत की हर चीज यहां आपको सस्ते और अच्छे दामों पर मिल जाएगी। तो अगली बार हाउसहोल्ड का सामान लेना हो तो एक बार दिल्ली के सबसे बड़े होलसेल बाजार सदर में जरूर जाएं।