हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे___क़ाएम चाँदपुरी

मोहम्मद क़यामुद्दीन ‘क़ाएम’ चाँदपुरी अठारहवीं सदी के मुम्ताज़ शाइ’रों में शामिल हैं। ‘क़ाएम’ चाँदपुरी की पैदाइश तक़रीबन 1725 में क़स्बा चाँदपुर, ज़िला बिजनौर के क़रीब ‘महदूद’ नाम के एक गाँव में हुई थी। लेकिन वो बचपन से दिल्ली में आ रहे और 1755 तक शाही मुलाज़मत के सिलसिले से दिल्ली में ही रहे। दिल्ली की तबाही और हालात की ना-साज़गारी से बद-दिल हो कर दिल्ली से टांडा पहुँचे। जब यहाँ के हालात भी अबतर हो गए तो उन्हें मजबूरन टांडा भी छोड़ना पड़ा। इस तरह उ’म्र भर रोज़गार की तलाश में हैरान-ओ-परेशान वो एक शहर से दूसरे शहर में फिरते रहे। आख़िर 1780 में रामपुर चले गए, जहाँ 1794 में वफ़ात पाई।

क़ाएम ने अपने कलाम पर सब से पहले शाह हिदायत से इस्लाह ली। उसके बाद ख़्वाजा मीर ‘दर्द’ और फिर मोहम्मद रफ़ीअ’ ‘सौदा’ के शागिर्द हुए। शेर ओ शाइरी के फ़न में इतने माहिर हो गए कि ‘मीर’, ‘मिर्ज़ा’ और ‘दर्द’ के बा’द उस ज़माने के बड़े शाइरों में उनका नाम लिया जाने लगा। ब-क़ौल मोहम्मद हुसैन आज़ाद “उनका दीवान हर्गिज़ ‘मीर’-ओ-‘मिर्ज़ा’ के दीवान से नीचे नहीं रख सकते।”

टूटा जो का’बा कौन सी ये जा-ए-ग़म है शेख़
कुछ क़स्र-ए-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा

ग़ैर से मिलना तुम्हारा सुन के गो हम चुप रहे
पर सुना होगा कि तुम को इक जहाँ ने क्या कहा

दर्द-ए-दिल कुछ कहा नहीं जाता
आह चुप भी रहा नहीं जाता

किस बात पर तिरी मैं करूँ ए’तिबार हाए
इक़रार यक तरफ़ है तो इन्कार यक तरफ़

मय की तौबा को तो मुद्दत हुई ‘क़ाएम’ लेकिन
बे-तलब अब भी जो मिल जाए तो इन्कार नहीं

न जाने कौन सी साअ’त चमन से बिछड़े थे
कि आँख भर के न फिर सू-ए-गुल्सिताँ देखा

चाहें हैं ये हम भी कि रहे पाक मोहब्बत
पर जिस में ये दूरी हो वो क्या ख़ाक मोहब्बत

ज़ालिम तू मेरी सादा-दिली पर तो रह्म कर
रूठा था तुझ से आप ही और आप मन गया

Rekhta

Private sector salaries logged slowest growth in a decade

Hit by decelerating sales growth, Indian companies are tightening spending on their wage bills. Private sector salaries recorded their worst growth in 10 years in fiscal year 2018-19. It was also the first time in seven years that the share of salaries in sales revenue came down.

These results are based on an HT analysis of the Prowess database compiled by the Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE). Prowess has 4,953 companies which have sales and salary data for the 10 years ending 2018-19. Not all of these companies have data on number of employees. However, just 3,353 of these 4,953 companies employed 8.2 million people in 2018-19.

Nominal wage and sales revenue growth of these 4,953 companies was 6% and 9% in 2018-19. Adjusted for inflation (using the Consumer Price Index for Industrial Workers), these figures are 0.53% and 3% for salary and sales growth.

What has led to this slump in wage growth in the private sector? Business has not been good for a long time. The companies listed in the Prowess database had negative real sales growth for four consecutive years beginning 2012-13.

There was a recovery in 2016-17 and 2017-18 but that seems to have reversed last year, with inflation-adjusted sales revenue growth falling from 4.5% in 2017-18 to 3% in 2018-19.

The short-lived revival seems to have led to a decision to put a squeeze on wage bills as part of a cost-cutting exercise.

Percentage share of wages and salaries in total sales revenue fell for the first time in seven years in 2018-19.

Another factor which could have encouraged companies to squeeze wages could be a rise in unemployment levels. The Periodic Labour Force Survey (PLFS) conducted by National Sample Survey Office shows that the unemployment rate reached a four-decade high of 6.1% in 2017-18. With jobs becoming scarce, the bargaining power of existing workers is bound to go down.

What does this mean for the larger economy? The combined salaries of these 4,953 companies was Rs 10.26 lakh crore in 2018, which is 12.8% of India’s total Private Final Consumption Expenditure in 2018-19.

A low sales revenue growth, lower wage growth and high unemployment rate environment is a dangerous vicious circle for any economy. Lower wage growth would adversely affect aggregate demand, which will further lower revenue growth in the future.

“These statistics only confirm what many of us have been saying for some time. The economic slowdown started much earlier, even though the government has only realised it recently”, said NR Bhanumurthy, professor of economics at National Institute of Public Finance and Policy. He also said that the problem started with demonetisation in 2016, worsened with GST in 2017 and has been averted further by external factors.

‘Airtel Black’ in the works to counter Reliance Jio’s new data plans, offers

All eyes are on Airtel’s next big move to counter Reliance’s Jio Fiber broadband, Jio PostPaid Plus, and other new services. Airtel hasn’t yet laid out its cards on the table yet but the operator is reportedly working to refresh its existing services to keep users interested. The focus, however, is on premium customers as it is looking to sustain average revenue per user (ARPU).

Airtel is working on an ‘Airtel Black’ package under its ‘Airtel Thanks’ programme to offer more premium bundled features, according to a report in Economic Times. The ‘Airtel Black’ will be available to subscribers with Rs 999 plan and above and will offer a big bundle of premium apps, access to OTT platforms, discounted international roaming, off on consumer brands and improved content offerings among others, the report added.

The report says ‘Airtel Black’ will help the company push lower tier of Airtel Thanks users to upgrade to more premium plans. Airtel currently offers postpaid plans at a starting price of Rs 499 per month. The base plan features 3G/4G data rollover up to 75GB, unlimited local/STD and roaming calls, three months of free access to Netflix, one year of Amazon Prime, and Airtel Thanks rewards.

Airtel had introduced ‘Airtel Thanks’ programme in October last year to offer more value-added services to customers with Rs 100 ARPU and above. The programme debuted with free access to OTT platforms for a limited time and exclusive offers on phones. Just recently Airtel announced offering free Hello Tunes to prepaid, postpaid users.

Airtel Black, if launched, will compete with Reliance’s ‘Jio Postpaid Plus’ programme. Unveiled at the AGM 2019 earlier this week, Reliance Jio is offering priority SIM setup service, seamless connectivity between devices, data sharing, and discounted international roaming plans. Jio will also push ‘Jio Postpaid Plus’ as a universal hub for its key home solutions.

Unlike Airtel’s premium customer focus, Reliance Jio is looking to increase its subscriber base even though it has already become the country’s top operator. RIL Chairman and Managing Director Mukesh Ambani revealed Jio had already surpassed 340 million subscribers in India and aims to hit 500 million subscribers in the near future.

Office Newz

क्या ग़ालिब के शेरों में आए ये लफ़्ज़ आपको भी मुश्किल में डालते हैं?

अच्छी शायरी का मुआमला ज़रा अलग क़िस्म का होता है, इसमें लफ़्ज़ों के परे एक ऐसी दुनिया होती है कि अगर आप उस तक पहुंचने से असमर्थ रहे तो शायरी के असल आनंद से वंचित रहेंगे। शायरी में इस्तेमाल हुए शब्द अर्थ के विस्तृत संसार तक पहुंचने का एक छोटा सा माध्यम मात्र होते हैं, आगे का सफ़र पाठक को ख़ुद तय करना होता है।

शायरों ने शब्दों के प्रयोग के कई ऐसे ढंग आविष्कार किए हैं जिनके ज़रिये कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अर्थ के विशाल संसार तक पहुंचा जा सकता है। उन्हीं में से एक तरीक़ा तल्मीह कहलाता है।

तल्मीह क्या है?

शायरी की परिभाषा में तल्मीह उस शिल्प को कहते हैं जिसमें शायर एक या दो शब्दों में किसी ऐसे ऐतिहासिक या पौराणिक घटना, क़िस्से या पात्र की तरफ़ इशारा करता है जिसको पूरी तरह जाने और समझे बग़ैर शेर को समझना और उससे आनंदित होना कठिन हो। जैसे मिर्ज़ा ग़ालिब का ये शेर,

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

इस शेर में इब्न के इलावा कोई ऐसा शब्द नहीं है जो मुश्किल हो। इब्न अरबी शब्द है जिसका अर्थ बेटे के हैं। लेकिन ये जान लेने के बाद भी शेर को समझना तब तक असम्भव है जब तक शेर में मौजूद इब्न-ए-मरियम की तल्मीह को न समझ लिया जाये।

इब्न-ए-मरियम की कहानी

इब्न-ए-मरियम इसराईल वंश के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का कुलनाम है। ईसा को उनकी माता मरियम की तरफ़ संकेत किया जाता है। कथनानुसार ख़ुदा ने उन्हें संतानोत्पत्ति के प्राकृतिक नियम के विरुद्ध अपने प्रभुत्व को प्रकट करने के लिए बिना बाप के पैदा किया था।

ख़ुदा ने ईसा को कुछ असाधारण चमत्कारों से भी नवाज़ा था, उन चमत्कारों में से एक चमत्कार ये था कि ईसा ‘क़ुम बि-इज़्निल्लाह’ (अल्लाह के हुक्म से खड़ा हो) कह कर मुर्दों को ज़िंदा कर दिया करते थे और फूंक मार कर पैदाइशी तौर पर नाबीना लोगों को आँख की रोशनी दे देते थे, कोढ़ के मर्ज़ में मुब्तला लोगों को अच्छा कर देते थे।

ईसा को उनकी इन्हीं विशेषताओं के लिए मसीह या मसीहा के नाम से भी जाना जाता है। मसीहा यानी वो शख़्स जो लोगों की बीमारियों और उनके दुखों का ईलाज करसके।

ग़ालिब ने अपने इस शेर में इब्न-ए-मरियम की तल्मीह इस्तिमाल करके इसी घटना की तरफ़ इशारा किया है।

ग़ालिब कहना चाहते हैं कि इब्न-ए-मरियम जो चाहे हुआ करे मुझे इससे क्या मतलब, बात तो तब है जब वो मेरे दुखों का ईलाज करसके।

ग़ालिब की शायरी में मौजूद कुछ अहम तल्मीहात

दम-ए-ईसा

ग़ालिब ने ईसा से सम्बन्धित उल्लेखित घटना को कई जगहों पर तल्मीही अंदाज़ में इस्तिमाल किया है। ग़ालिब का एक और शेर है,

मर गया सदमा-ए-यक-जुम्बिश-ए-लब से ‘ग़ालिब’ 
ना-तवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसी न हुआ

इस शेर में दम-ए-ईसी अर्थात ईसा की फूंक का ज़िक्र है। ग़ालिब कहते हैं कि मैं इतना कमज़ोर और बीमार हो गया कि जब ईसा ने मुझे ठीक करने के लिए अपने होंट खोले तो मैं उसकी भी ताब न ला सका और उनके होंटों से निकलने वाली हल्की सी हवा के सदमे से ही मर गया। इस तरह ईसा जो मुझे अच्छा करने के लिए आए थे, मौत का कारण बने।

साग़र-ए-जम

साग़र-ए-जम की तल्मीह ईरान के मशहूर बादशाह जमशेद से मुताल्लिक़ है। मशहूर है कि फ़ारस के हकीमों ने बादशाह के लिए एक साग़र यानी शराब का प्याला तैयार किया था जिसके अंदर कुछ रेखाएं खिंची हुई थीं। ये सात रेखाएं थीं, उनके नाम ये थे। ख़त-ए-जौर, ख़त-ए- बग़दाद, ख़त-ए-बस्रा, ख़त-ए-अरज़क, ख़त-ए-शुक्रिया, ख़त-ए-अश्क, ख़त-ए-साग़र।

पहले ख़त तक अगर शराब भरी हुई होती थी तो इसका मतलब था कि उसको बादशाह के इलावा कोई और नहीं पी सकता। दूसरे ख़त तक शराब भर कर सिर्फ़ बादशाह के ख़ानदान के लोग पी सकते थे। उसके बाद सलतनत के सदस्यों और अमीरों का नंबर आता था। ग़ालिब ने इस तल्मीह को अपने मशहूर शेर में इस तरह इस्तिमाल किया है,

और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है

जाम-ए-सिफ़ाल, यानी मिट्टी का प्याला। ग़ालिब कहते हैं कि साग़र-ए-जम से अपना मिट्टी का प्याला ही अच्छा है, अगर टूट भी जाये तो कोई ग़म नहीं, बाज़ार से दूसरा प्याला ले आएँगे। साग़र-ए-जम एक नायाब प्याला है, इसकी तरह का कोई और प्याला दुनिया में उपलब्ध नहीं।

लक़ा की दाढ़ी और अम्र की ज़ंबील

लक़ा की दाढ़ी और अम्र की ज़ंबील, ये दोनों तल्मीहात दास्तान-ए-अमीर हमज़ा से हैं। लक़ा दास्तान अमीर हमज़ा का केन्द्रीय पात्र है और एक ऐसा बादशाह है जो अपने ख़ुदा होने का दावा करता है। अमीर हमज़ा की उससे सैकड़ों जंगें हुईं।

दास्तान के मुताबिक़ लक़ा का क़द बहुत ऊँचा था और उसकी दाढ़ी कई गज़ लंबी और चौड़ी थी। ये दाढ़ी हर वक़्त जवाहरात से सुसज्जित रहती और उसके हर हर बाल में हीरे-जवाहरात पिरोए होते।

अमरो की ज़ंबील

ज़ंबील का अर्थ टोकरी, झोली और कासे का है। अम्र अमीर हमज़ा की फ़ौज में एक अय्यार है। उसे बुज़ुर्गों से बहुत से अजाइबात मिले हैं। उन्हीं में से एक उसकी ज़ंबील भी है। इस ज़ंबील की ख़ूबी ये है कि हर चीज़ इसमें समा जाती है और ये कभी भरती नहीं । इस ज़ंबील में एक दुनिया आबाद थी, जिसमें जिन्न,शैतान और जादूगर क़ैद थे। ये सब अम्र के क़ैदी थे और उनसे इसी ज़ंबील में सज़ा के तौर पर खेती-बाड़ी कराई जाती थी।

इन दोनों तल्मीहों को ग़ालिब ने अपने एक शेर में इस तरह इस्तिमाल किया है,

दुर्र-ए-मअनी से मिरा सफ़्हा लक़ा की दाढ़ी
ग़म-ए-गेती से मिरा सीना उम्र की ज़ंबील

ग़ालिब कहते हैं मेरा वो काग़ज़ जिस पर मैंने शेर लिखे हैं अर्थ के मोतियों से इसी तरह भरा हुआ है जैसे लक़ा की दाढ़ी मोतियों से भरी होती थी और दुनिया जहान के ग़म मेरे सीने में वैसे ही समायए हैं जैसे उम्र की ज़ंबील, जिसमें हर चीज़ समा जाती थी और वे कभी भरती ही नहीं थी।

जू-ए-शीर

जू-ए-शीर फ़ारसी तरकीब है, जिसमें जू का अर्थ नहर है, और शीर दूध को कहते हैं। इस दूध की नहर की कहानी बहुत दिलचस्प है। कहा जाता है कि फ़र्हाद, ख़ुसरो परवेज़ की पतनी शीरीं पर आशिक़ हो गया था। उसका ये इश्क़ बढ़ता ही चला गया और सारे शहर में उसके चर्चे आम होगए। फ़र्हाद से पीछा छुड़ाने के लिए ख़ुसरो ने उससे कहा, अगर तुम पहाड़ काट कर एक नहर निकाल सको जिसके ज़रिये महल तक दूध लाया जा सके तो शीरीं तुम्हारे हवाले कर दी जाएगी। फ़र्हाद शीरीं को पाने के लिए इस असम्भव काम में जुट गया और बरसों की मेहनत के बाद एक विशाल पहाड़ काट कर नहर निकाल दी।
ग़ालिब इसी कहानी से शेर बनाते हैं;

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ 
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

ग़ालिब कहते हैं कि जुदाई की रातों की मुसीबतें न पूछो, महबूब के वियोग में रात काटना उतना ही मुश्किल है जितना फ़र्हाद के लिए पहाड़ काट कर जू-ए-शीर यानी दूध की नहर निकालना था।

कोह-कन , पीरज़न

कोह-कन, दो शब्दों से मिलकर बना है कोह और कन, कोह का अर्थ पहाड़ है और कन काटने वाला, ये फ़र्हाद का उपनाम है। फ़र्हाद ने शीरीं को पाने के लिए पहाड़ काट कर दूध की नहर निकाली थी।

पहाड़ काटने के बाद जब शीरीं को पाने की बारी आई तो ख़ुसरौ, शीरीं का शौहर अपने वादे से मुकर गया, उसे शीरीं की जुदाई किसी तरह गवारा न थी। उसने चाल चली और अपने एक मुसाहिब को बूढ़ी औरत के भेस में फ़र्हाद के पास भेजा और ये ख़बर पहुंचाई की शीरीं मर गई है।

फ़र्हाद इस झूठी ख़बर का सदमा बर्दाश्त न करसका। तीन बार शीरीं का नाम लिया और जिस तेशे (औज़ार) से पहाड़ काटा था वही औज़ार अपने सर पर मार लिया और जान दे दी।
ग़ालिब का शेर है,
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन ‘असद’
सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था

दूसरे शेर में कहते हैं,

दी सादगी से जान पड़ूँ कोहकन के पांव
हैहात क्यों न टूट गए पीरज़न के पांव

पीरज़न की तल्मीह उस बूढ़ी औरत के लिए इस्तिमाल की गई है जिसने फ़र्हाद को शीरीं के मरने की झूटी ख़बर दी थी।

ज़ुलेख़ा, ज़नान-ए-मिस्र, माह-ए-कनआँ

सब रक़ीबों से हों ना-ख़ुश पर ज़नान-ए-मिस्र से
है ज़ुलेख़ा ख़ुश कि महव-ए-माह-ए-कनआँ हो गईं

इस शेर में ग़ालिब ने एक ही घटना से सम्बंधित तीन तल्मीहें इस्तिमाल की हैं। ज़ुलेख़ा जो बादशाह-ए-मिस्र की बीवी थी और निहायत हसीन थी। माह-ए-कनआँ हज़रत यूसुफ़ का उपनाम है। यूसुफ़ कनआँ में रहते थे और बहुत ही सुंदर इन्सान थे, इसी सम्बन्ध से उन्हें माह-ए-कनआँ यानी कनआं का चांद कहा गया। ज़नान-ए-मिस्र, मिस्र की वो औरतें जो यूसुफ़ से प्यार करने पर ज़ुलेख़ा का मज़ाक़ उड़ाती थीं।

वाक़िया ये था कि ज़नान-ए-मिस्र ज़ुलेख़ा पर ताने कसती थीं कि तुम एक ग़ुलाम पर आशिक़ हो गई हो। मजबूर हो कर ज़ुलेख़ा ने बहुत सी औरतों को जमा किया और सबके हाथ में एक एक सेब और छुरी दे दी और कहा कि जब यूसुफ़ सामने आए तो सेब काटना। यूसुफ़ जैसे ही कमरे में दाख़िल हुए तो औरतें सेब काटने लगीं। लेकिन वो यूसुफ़ की सुंदरता में इतनी तल्लीन हो गईं और उनके हुस्न के फ़रेब में इस क़दर आगईं कि सेब के बजाय अपनी अपनी उंगलियां काट लीं। औरतों की ये बेख़ुदी देखकर ज़ुलेख़ा ख़ुश हुई। इसी घटना से ग़ालिब शेर बनाते हैं।

आम क़ायदा ये है कि आशिक़ अपने रक़ीबों (प्रतिद्वंदियों) से जलते हैं और परेशान होते हैं लेकिन यहां अजब मुआमला है कि ज़ुलेख़ा अपने रक़ीबों से ख़ुश है कि वो भी यूसुफ़ पर उसी तरह मुग्ध हो गई हैं।

औरंग-ए-सुलेमां, तख़्त-ए- सुलेमां

इक खेल है औरंग-ए-सुलैमाँ मिरे नज़दीक
इक बात है एजाज़-ए-मसीहा मिरे आगे

ये शेर दो तल्मीहात पर आधारित है। औरंग-ए-सुलेमां और एजाज़-ए-मसीहा । एजाज़-ए-मसीहा के बारे में और उपर तफ़सील से बताया जाचुका है कि उन्हें ख़ुदा की तरफ़ से कुछ ख़ास चमत्कार दिए गए थे। वो मुर्दों को ज़िंदा कर देते थे, अंधे लोगों को आँखों की रोशनी दे देते थे वग़ैरा। औरंग-ए-सुलेमां का अर्थ सुलेमान का तख़्त है। सुलेमान ख़ुदा के पैग़म्बर थे, उनके पास एक ऐसा तख़्त था जो हवा में उड़ा करता था। वो उस तख़्त के ज़रिये जहां चाहते चले जाते। ग़ालिब इस शेर में कहते हैं मैं तख़्त-ए- सुलेमां को एक खेल समझता हूँ और एजाज़-ए-मसीहा मेरे लिए एक मामूली सी बात है। ये शेर ग़ालिब की ख़ुदी और दुनिया की तमाम-तर शान-ओ-शौकत को तुच्छ समझने का बयान है।

और तल्मीहात

ग़ालिब और दूसरे क्लासिकी शायरों की शायरी में इनके इलावा भी बहुत सी तल्मीहात इस्तिमाल हुई हैं। अगर आप इस तरह की और तल्मीहात और उनके के पीछे की रोचक कहानियों को जानने और समझने में दिलचस्पी रखते हैं तो रेख़्ता पर मौजूद तल्मीहात के सफ़हे पर पढ़ सकते हैं।

Rekhta

Kabhi kisi ko mukammal jahan nahin milta

Film: Ahista Ahista 1981

kabhī kisī ko mukammal jahāñ nahīñ miltā
kahīñ zamīn kahīñ āsmāñ nahīñ miltā

tamām shahr meñ aisā nahīñ ḳhulūs na ho
jahāñ umiid ho is kī vahāñ nahīñ miltā

kahāñ charāġh jalā.eñ kahāñ gulāb rakheñ
chhateñ to miltī haiñ lekin makāñ nahīñ miltā

ye kyā azaab hai sab apne aap meñ gum haiñ
zabāñ milī hai magar ham-zabāñ nahīñ miltā

charāġh jalte hī bīnā.ī bujhne lagtī hai
ḳhud apne ghar meñ hī ghar kā nishāñ nahīñ miltā

सौम्यता, दृढ़ता, आत्मीयता का नाम थी सुषमा स्वराज

माथे पर बड़ी सी बिंदी और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान, बातें जो वो कर सकती थीं, बस वो ही कर सकती थीं। जब बोलती थीं, तब लगता था कि बस सुनते जाओ और ऐसे ही बोलो। जी हाँ, ये छवि किसी और की नहीं बल्कि सुषमा स्वराज की ही है। कल रात उन्होंने आखिरी सांस ली। 67 वर्षीय सुषमा स्वराज का तीन साल पहले ही किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था। और कल दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा में कुशल प्रवक्ता, 9 बार की सांसद सुषमा स्वराज को उनके किए गए कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

शिक्षा पूरी होने के बाद सुषमा स्वराज सक्रिय राजनीति से जुड़ गईं। सन 2014 में वे भारत की विदेश मंत्री बनने वाली पहली महिला बनीं। उनसे पहले इंदिरा गांधी दो बार कार्यवाहक विदेश मंत्री रह चुकी थीं। प्रखर और ओजस्वी वक्ता, प्रभावी पार्लियामेंटेरियन और कुशल प्रशासक मानी जाने वाली सुषमा स्वराज एकमात्र नेता थीं, जिन्होंने अपनी पार्टी से उत्तर और दक्षिण भारत दोनों क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। वह भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता थीं जिन्हें असाधारण सांसद चुना गया। वह किसी भी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता भी थीं। इसके अलावा वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री भी बनीं। संसद में इनकी बोलने की शैली हिंदी बोलने के लिए प्रेरित करने वाली होती थी। 

सोशल मीडिया लोगों की मदद का माध्यम कैसे बन सकता है? इसकी नीवं सुषमा जी ने विदेश मंत्री रहते हुए रखी। वह सिर्फ एक ट्वीट पर विदेश में फंसे किसी भारतीय की मदद के लिए तुरंत सक्रिय हो जाती थीं। भारतीय मूल के लोगों ने पासपोर्ट गुम होने और विदेश में फंसे भारतीयों के परिजनों ने सुषमा के सामने मदद की गुहार लगाई जिस पर वे हमेशा बढ़-चढ़कर मदद के लिए तत्‍पर रहीं। उनके पास मदद के लिए जो भी पहुंचा, वे उससे इतनी आत्‍मीयता से मिलती थी जैसे वह उनका कोई अपना हो। जैसे गीता, वही गीता जो बोल और सुन नहीं सकती हैं वो 10-11 साल की उम्र में पाकिस्तानी रेंजर्स को मिली थी। सुषमा स्वराज की कोशिशों के बाद 2016 में गीता को भारत लाया जा सका था। गीता के भारत लौटने के बाद सुषमा स्वराज ने उन्हें ‘हिंदुस्तान की बेटी’ कहा था, सुषमा स्वराज गीता के हाथ पीले करना चाहती थीं।

सौम्यता, दृढ़ता, आत्मीयता का नाम थी सुषमा स्वराज। मॉम्सप्रेस्सो उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देता है। 

क्या ऐसीं किसी माँ या पिता को आप जानते है जो कुछ अनोखा कर रहे हैं? क्या आपको लगता है आपके पास ऐसी कोई रोचक या दिलचस्प कहानी हैं, जिसे माँ के लिए खास खबर के अंतर्गत प्रकाशित किया जाना चाहिए? तो जल्दी से हमें इस ईमेल info.readwritee@gmail.com पर लिख भेजें।

Tricks to Appear Smart During Conferences

Like everybody, showing sensible throughout conferences is my high priority. generally this may be tough if you begin castle in Spain concerning your next vacation, your next nap, or bacon. once this happens, it’s smart to possess some pull out tricks to fall back on. Here are some tricks for quickly showing sensible throughout conferences.

Draw a Venn diagram

Getting up and drawing a Venn diagram is a great way to appear smart. It doesn’t matter if your Venn diagram is wildly inaccurate, in fact, the more inaccurate the better. Even before you’ve put that marker down, your colleagues will begin fighting about what exactly the labels should be and how big the circles should be, etc. At this point, you can slink back to your chair and go back to playing Candy Crush on your phone.

Translate percentage metrics into fractions

If someone says “About 25% of all users click on this button,” quickly chime in with, “So about 1 in 4,” and make a note of it. Everyone will nod their head in agreement, secretly impressed and envious of your quick math skills.

Encourage everyone to “take a step back”

There comes a point in most meetings where everyone is chiming in, except you. Opinions and data and milestones are being thrown around and you don’t know your CTA from your OTA. This is a great point to go, “Guys, guys, guys, can we take a step back here?” Everyone will turn their heads toward you, amazed at your ability to silence the fray. Follow it up with a quick, “What problem are we really trying to solve?” and, boom! You’ve bought yourself another hour of looking smart.

Nod continuously while pretending to take notes

Always bring a notepad with you. Your rejection of technology will be revered. Take notes by simply writing down one word from every sentence that you hear. Nod continuously while doing so. If someone asks you if you’re taking notes, quickly say that these are your own personal notes and that someone else should really be keeping a record of the meeting. Bravo compadre. You’ve saved your ass, and you’ve gotten out of doing any extra work. Or any work at all, if you’re truly succeeding.

Repeat the last thing the engineer said, but very very slowly

Make a mental note of the engineer in the room. Remember his name. He’ll be quiet throughout most of the meeting, but when his moment comes everything out of his mouth will spring from a place of unknowable brilliance. After he utters these divine words, chime in with, “Let me just repeat that,” and repeat exactly what he just said, but very, very slowly. Now, his brilliance has been transferred to you. People will look back on the meeting and mistakenly attribute the intelligent statement to you.

Ask “Will this scale?” no matter what it is

It’s important to find out if things will scale no matter what it is you’re discussing. No one even really knows what that means, but it’s a good catch-all question that generally applies and drives engineers nuts.

Pace around the room

Whenever someone gets up from the table and walks around, don’t you immediately respect them? I know I do. It takes a lot of guts but once you do it, you immediately appear smart. Fold your arms. Walk around. Go to the corner and lean against the wall. Take a deep, contemplative sigh. Trust me, everyone will be shitting their pants wondering what you’re thinking. If only they knew (bacon).

Ask the presenter to go back a slide

“Sorry, could you go back a slide?” They’re the seven words no presenter wants to hear. It doesn’t matter where in the presentation you shout this out, it’ll immediately make you look like you’re paying closer attention than everyone else is, because clearly they missed the thing that you’re about to brilliantly point out. Don’t have anything to point out? Just say something like, “I’m not sure what these numbers mean,” and sit back. You’ve bought yourself almost an entire meeting of appearing smart.

Step out for a phone call

You’re probably afraid to step out of the room because you fear people will think you aren’t making the meeting a priority. Interestingly, however, if you step out of a meeting for an “important” phone call, they’ll all realize just how busy and important you are. They’ll say, “Wow, this meeting is important, so if he has something even more important than this, well, we better not bother him.”

Make fun of yourself

If someone asks what you think, and you honestly didn’t hear a single word anyone said for the last hour, just say, “I honestly didn’t hear a single word anyone said for the last hour.” People love self-deprecating humor. Say things like, “Maybe we can just use the lawyers from my divorce,” or “God I wish I was dead.” They’ll laugh, value your honesty, consider contacting H.R., but most importantly, think you’re the smartest looking person in the room.