धुंआ ख्वाहिशें..

राजू_उपाध्याय

मेरा मीत आज हुआ कुछ,बावला सा है ।
शायद मन कहीं, कुछ छला छला सा है।

उजड़ा जब नशेमन झोंके के इक दम से ,
दिल की बस्ती में उठा ज़लज़ला सा है।

सन्नाटों का शोर है मचल गईं बिजलियां,
मौसम भी देखिये,हुआ वो सांवला सा है।

सिलसिला चाहतों का कहां पर आ थमा ,
मलाल और सवाल भी, दिलजला सा है।

दिल उदास-उदास है ,हुई धुआं ख्वाहिशे,
ये उनकी नई नजर,सावन मनचला सा है।

बूंद आसमां को छोड़ जमीं से आ मिली,
रिश्ता अजब,गोया दिल का मामला सा है।

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