संस्कृति का सूचक है राजस्थानी पहनावा…

राजस्थान देश भर में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के रीति- रिवाज, यहां के लोगों का पहनावा तथा भाषा सादगी के साथ- साथ अपनेपन का भी अहसास कराती है। राजस्थान में लोगों को अपनी एकता के लिए जाना जाता है। राजस्थान के लोगों का रहन-सहन सादा और सहज है। राजस्थान के लोग जीवटवाले तथा ऊर्जावन होते हैं साथ ही जीवन के हर पल का आनंद उठाते हैं। राजस्थानी महिलाएं अपनी सुंदरता के लिए मशहूर हैं।

राजस्थान के लोग रंगीन कपड़े और आभूषणों के शौकीन होते हैं। रहन-सहन, खान-पान और वेशभूषा में समय के साथ थोड़ा-बहुत परिवर्तन तो आया है, लेकिन राजस्थान अभी अन्य प्रदेशों की तुलना में अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं को सहेजे हुए है। राजस्थान में भोजन वहां की जलवायु के आधार पर अलग-अलग प्रकार से बनता है। पानी और हरी सब्जियों की कमी होने की वजह से राजस्थानी व्यंजनों की अपनी एक अलग ही शैली है।

राजस्थानी व्यंजनों को इस तरह से पकाते हैं कि वो लंबे समय तक खराब नहीं होते तथा इन्हें गरम करने की आवश्यकता भी नहीं होती। रेगिस्तानी जगहों जैसे – जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर में दूध, छाछ और मक्खन पानी के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में अधिकतर खाना शुद्ध घी से तैयार किया जाता है। यहां पर दाल-बाटी-चूरमा बेहद मशहूर है। जोधपुर की मावा कचौड़ी, जयपुर का घेवर, अलवर की कलाकंद और पुष्कर का मालपुआ, बीकानेर के रसगुल्ले, नमकीन भुजिया, दाल का हलवा, गाजर का हलवा, जलेबी और रबड़ी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। भोजन के बाद पान खाना भी यहां की परंपरा में शुमार है।

राजस्थानी वेशभूषा राजस्थान के लोगों का पहनावा रंग-रगीला है। रेत और पहाड़ियों के सुस्त रंगों के बीच चमकीले रंगों की पोशाक राजस्थान के लोगों को जीवंत बनाती है। सिर से लेकर पांव तक, पगड़ी, कपड़े, गहने और यहां तक कि जूते भी राजस्थान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं। सदियों बीत जाने के बाद भी यहां की वेशभूषा अपनी पहचान बनाये हुए है।

राजस्थान की जीवन शैली के आधार पर अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग परिधान के अंतर्गत पगड़ी यहां के लोगों की शान और मान का प्रतीक है। यहां के लोग 1000 से भी अधिक प्रकार से पगड़ी बांधते हैं। कहा जाता है कि यहां हर 1 किमी. से पगड़ी बांधने का तरीका बदल जाता है। पुरुष पोशाक में पगड़ी, अंगरखा, धोती या पजामा, कमरबंद या पटका शामिल है और महिलाओं की पोशाक में घाघरा, जिसे लंबी स्कर्ट भी कहते हैं, कुर्ती या चोली और ओढ़नी शामिल हैं। घाघरे की लंबाई थोड़ी छोटी होती है ताकि पांव में पहने गहने दिखायी दे सकें और ओढ़नी घूंघट करने के काम आती है।

ऊंट, बकरी और भेड़ की खाल से बने जूते पुरुष और महिलाओं के जरिये पहने जाते हैं। मखमल या जरी के ऊपर कढ़ाई कर के जूते के बाहरी भाग पर चिपकाया जाता है। जैसलमेर, जोधपुर, रामजीपुरा और जयपुर की जूतियां पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

राजस्थानी पहनावा :

राजस्थान की पोशाकें भी यहां की प्रकृति, मौसम, जलवायु और पारिस्थितिकी से प्रेरित होती हैं। राजस्थानी पोशाकें बहुउपयोगी भी होती हैं। आइये, राजस्थानी पोशाकों के वैज्ञानिक धरातल को खोजने का प्रयास करें।

साफा

राजस्थान में पुरूष सिर पर साफा बांधते रहे हैं। साफा सिर्फ एक पहनावा नहीं है। राजस्थान में नौ माह लगभग गर्मी पड़ती है और तीन माह तेज गर्मी पड़ती है। ऐसे में साफे की कई परतें सिर को लू के थपेड़ों और तेज धूप से बचाती हैं। राजस्थान वीरों की भूमि भी रही है। यदा कदा यहां भूमि और आन के युद्ध से भी गुजरना पड़ता था। ऐसे में आपात प्रहार से बचने में भी साफा ’हेलमेट’ का काम किया करता था। इसके अलावा साफा कूएं से पानी निकालने की रस्सी, तौलिया, चादर, छलनी, अस्त्र, सामान रखने की गठरी आदि कई रूपों में काम आता था।

कुर्ता धोती

राजस्थानी कुर्ता धोती यहां तप्त वातावरण में अनुकूल पोशाकों के काम करते हैं। कुर्ता धोती प्राय: सफेद रंग के होते हैं। सफेद रंग गर्मी को ऑब्जर्व नहीं करता और ठंडक बनाए रखता है। यही कारण है यहां सफेद धोती कुरता का प्रयोग गर्मी से शरीर को बचाने के लिए किया जाता रहा। साथ ही सूती और खुले खुले होने के कारण कुर्ता धोती पहनने वाले को विशेष आराम भी दिया करते थे। वैज्ञानिक तौर पर यहां की जलवायु में कुर्ता धोती से बेहतर कोई पोशाक नहीं है।

जूतियां

राजस्थान में जूतियां पहने का प्रचलन रहा। जूतियां मुख्यत: ऊंट की खाल से बनाई जाती थी। ये जूतियां जहां पहनने में आसान होती थी वहीं शरीर के लिए भी ये नुकसानदेह नहीं होती थी। जूतियां पैरों की शेप को सही रखने के साथ साथ सर्दी और गर्मी में पैरों को विशेष आराम दिया करती थी। सर्दियों में जूतियां गर्म और गर्मियों में ठंडी रहा करती थी। राजस्थान के लोग बरसात के मौसम में जूतियां नहीं पहनते थे। इससे चर्मरोग का खतरा रहता था और जूतियां खराब होने का डर भी।

घाघरा-चोली

राजस्थान की महिलाएं घाघरा चोली पहना करती थी। आज भी ग्रामीण इलाकों में घाघरा चोली पहनी जाती है। राजस्थानी महिलाएं आरंभ से ही बहुत कर्मशील रही हैं। ऐसे में घाघरा चोली बहुत जल्द पहना जा सकता है। साड़ी की तरह इसे पहनने में न असुविधा होती है और न ही ज्यादा समय खराब होता है। इसके साथ ही राजस्थानी महिला हमेशा कर्मशील रही है। वह घर, खेत और आजीविका जुटाने में पुरुषों का भरपूर साथ देती है। घाघरा चोली गर्मी के वातावरण में शरीर को स्वस्थ भी रखते हैं और महिलाओं की कर्मशीलता के साथी भी बनते हैं।

ओढनी

राजस्थानी ओढनी राजस्थान की परंपराओं का प्रतीक है। ओढनी न केवल महिलाओं द्वारा सिर पर ओढा जाने वाला एक वस्त्र है बल्कि यह राजस्थानी महिला के मान का प्रतीक भी है। विभिन्न त्योंहारों उत्सवों और शादी विवाह के अवसरों पर कोई भी कार्य ओढनी के बिना नहीं किया जाता। तात्पर्य यह है कि महिलाएं घाघरा चोली पहन कर चाहे पुरुषों के साथ कितना ही कार्य करें, उनपर ओढनी

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