दीदी के इस हाल का जिम्मेदार कौन?

हेलो भाभी, दीपिका दी के बारे में कुछ पता चला?

नहीं ,मेरे से तो काफी समय से कोई बात नहीं हुई, उसका फोन भी स्विच ऑफ ही जा रहा है। “परमात्मा करे सब ठीक हो”। दोनों भाभी-नन्द आपस में फोन करके दीपिका दी के बारे में बातें जरूर कर रही थी, लेकिन मन सब का जानता था कि कुछ ठीक नहीं है। दोनों बहनों का भाभी के साथ बहुत अच्छा रिश्ता था। तीनों बहनों की तरह रहती थी।

गांव के प्रतिष्ठित जमीदार के बहुत बड़े घर की सबसे बड़ी पुत्री थी दीपिका। परिवार की प्रतिष्ठा के अनुरूप दोनों बहने और दोनों भाई का अच्छे परिवारों में विवाह संपन्न हो गया था। बड़ी भाभी अपनी दोनों नन्दों को बहुत प्यार करती थी तो वहीं छोटी भाभी थोड़ी तेज मिजाज की थी।

यूं तो दीपिका का विवाह भी साथ ही के गांव के प्रतिष्ठित जमीदार परिवार के रकेश से हुआ था, रकेश की दोनों बहने भी साथ ही के गांव में ब्याही गईं थी। पिता का साया सर पर से उठने के बाद मां का लाड प्यार और अंतहीन पैसा, राकेश की उद्दंडता बढ़ाता चला गया। शादी के बाद भी पूरा दिन असामाजिक तत्वों के साथ बिताना और सब गलत काम करना, उसकी आदत बन गई थी। अपनी बहनों और ससुराल पक्ष से भी झूठ बोलकर वह काफी पैसे ऐंठ चुका था। मां की मृत्यु के बाद राकेश की दोनों बहनों ने अपना हिस्सा ले लिया था। और राकेश ने अपने हिस्से को गंवाने में चंद महीने ही लगाए। घर बाहर सब को धोखा देने के बाद, जब घर का सब कुछ बिक गया तो जीविकोपार्जन के लिए किसी दोस्त ने उसे उड़ीसा का रास्ता दिखाया। घर से बहुत दूर अपने पति के सुधरने की आस लिए दीपिका अपने बच्चों को लेकर उड़ीसा चली गई।

अनजान शहर और अनजान नगर में किराए का मकान लेकर कुछ दिन तो राकेश ने मजदूरी करके ठीक से काटे। बाद में वहां भी उसने अपना एक गिरोह  बना लिया। गाहे-बगाहे पुलिस घर पर आती रहती और चोर सिपाही का खेल चलता रहता। इलाज के अभाव में, उसकी पुत्री भी चल बसी थी।

ऐसा नहीं था कि वह अपने जीवन यापन की उम्मीद लेकर अपने माता -पिता के घर ना आई हो। माता पिता वृद्धावस्था की बीमारियों के साथ बिस्तर पर लगे, खुद छोटे बेटे बहु के साथ दिन काट रहे थे। छोटी भाभी अपने कान्वेंट में पढ़ने वाले बच्चों के सर पर गालियां बकने वाले दीपिका के बच्चों का साया भी नहीं पढ़ने देना चाहती थी। वह तो डाइनिंग टेबल पर रखे खाने को भी  हैरान होकर देखते थे। अपने कमरे में भाभी को दीपिका के बच्चों का पूरा ध्यान रखना पड़ता था कि कहीं वह कुछ चुरा ना ले। उसी परिवार की स्वाभिमानी दीपिका भूख से मरना तो स्वीकार कर लेती लेकिन अपने ही घर के लोगों का  व्यवहार उसे अंदर तक तोड़ देता था।

कभी अपनी बहन के पास भी में चली जाती, तो उसकी सास, तो कभी ननद या किसी कोई और ऐसा असहज व्यवहार करता  कि वह बेचैन होकर वापस अपने उड़ीसा में ही चली जाती थी। अब तो ससुराल के घर में भी उसका कोई हिस्सा नहीं बचा था। और बड़े भाई-भाभी विदेश में थे तो उनके बुलाने पर भी वह वहां नहीं जाती थी।

अमीर परिवारों की इकलौती गरीब, जब कभी भूखे पेट अपने बच्चे के साथ दिन काटती तो यही सोचती थी कि काश उसके माता-पिता ने उसकी शादी की बजाय अगर पढ़ा दिया होता तो आज यह दिन ना देखना पड़ता। घूंघट करके घरों में बर्तन मांजने का काम भी उसे स्वीकार्य था, परंतु राकेश का क्रिमिनल रिकॉर्ड देखते हुए कोई भी उसे घर के काम पर भी ना रखता।

कुछ दिन पहले ही उसने रोते-रोते भाभी को बताया कि उसका बेटा भी पिता की राह पर ही चल निकला और अबकी बार पुलिस उसे भी पकड़ कर ले गई। अच्छी बातें तो सब करते हैं पर सहारा कौन देता है?

उसके बाद काफी समय से दीपिका का किसी को भी कोई फोन नहीं आया।  उसका फोन भी बंद पड़ा था।

पाठकगण,समाज पतन की ओर जा रहा है, “रिश्तों का और प्यार का कोई मूल्य नहीं रह गया है”, यह बातें करते हुए कभी किसी ने अपने मन में झांकने का प्रयत्न किया है कहीं समाज के इस पतन में हमारा खुद का भी कोई योगदान तो नहीं।

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