वो गेंदे के फूलों की वरमाला

दिपक और नेहा एक -दूसरे से प्यार करते थे, फिर एक दिन दिपक ने अपनी पसंद नेहा के बारे में अपने परिवार को बता कर शादी के लिए दोनों परिवारों की सहमति ले ली थी। लम्बे इंतजार के बाद शादी की डेट फिक्स हो गई थी। जान-पहचान होने के कारण दोनों एक-दूसरे से काफी जुड़ गए थे।शादी की सारी तैयारियां दीपक और नेहा साथ मिलकर ही कर रहे थे। शादी के दो महीने पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थी।

दीपक ने अपने दोनों के लिए अपने घर की दूसरी मंजिल पर रूम, किचन-बाथरूम को फिनिश करवाया तो वहीं नेहा ने अपने घर और किचन को सजाने के लिए कोई भी चीज की खरीदारी में कोई कमी नहीं की। रूम और किचन के लिए एक-एक जरूरत का सामान खरीदा।

दीपक और नेहा ने शादी में पहनने के लिए कपड़े भी एक-दूसरे की पसन्द को ध्यान में रख कर लिए। नेहा ने दुल्हन सेट से लेकर छोटी बिंदी भी सोंच -समझकर खरीदी। अपना शादी में दोनों कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।

दो महीने पलक झपकते ही बीत गए, अब विवाह का दिन भी आ गया। शादी जून के महीने में अंतिम लग्न में थी। उसके बाद कोई मुहर्त नहीं थे।और शादी एक नामी शिव मंदिर से हो रही थी।मन्दिर के पास धर्मशाला में रूम भी लिए थे बारात को ठहरने के लिए और लड़की को सजने-सवरने के लिए। सभी तैयारियां हो गयी थी। एक सुपारी तक नहीं भूले थे।

नेहा के माता-पिता ने सिर्फ वरमाला नही खरीदे थी बाकी सब कुछ बहुत ही अच्छे से किया था। क्योंकि दीपक ने कहा था कि वह बहुत सुंदर ताजे फूलों की माला खरीद कर लाएगा जिससे शादी के जोड़े में चार चांद लग जाएंगे। दीपक के कहने पर नेहा के परिवार वाले निश्चित होकर माला नहीं खरीद कर लाए थे। विवाह के दिन बारात समय से मन्दिर के पास की धर्मशाला में आ गई थी।

दुल्हन भी सज गयी थी। दुल्हन की सहेलियां और भाभी ने फूलों और आरती की थाल भी सजा ली।पर,माला—–।

अरे माला लाओ जल्दी, माला तो मिली नहीं अब तक.. दुल्हन की भाभी ने आवाज लगाई।

सबका ध्यान माला पर गया, नेहा ने दीपक को फोन कर माला के बारे में पूछा तो दीपक ने भी भूल पर पछतावा करते हुए कहा, मैं तो भूल ही गया खरीदना।”

अब इतने रात को माला कहाँ मिलेंगे जल्दी-जल्दी दोनों पक्ष के लोग माला के लिए दौड़ गए। मन्दिर के पास की भी सभी दुकाने लगभग बन्द हो गई थी। एक जड़ी-बूटी की दुकान खुली थी उसमें से दो माला ले आएं। जल्दी से दीपक की दीदी, भाभी और चाची ने भी कहा जो भी माला मिले उसी से जयमाला करवा लो अब।दु

ल्हन बनी नेहा ने जैसे ही वो माला देखी, नेहा का सर ही चकरा गया।

वो माला जो,भगवान जी को पहनाते है कूट(गत्ते)की, चिमकी लगे हुए थी।

नेहा ने कहा कि,’नही ये नहीं पहनाऊँगी मैं और ना ही पहनूँगी। नकली माला ही ले आओ बदले में पर ये नही।

फिर सभी माला के लिए इधर-उधर भागने लगे। नकली माला भी नहीं मिली, रात बहुत हो रही थी दुकाने भी बंद हो गई थी। अब मन्दिर के पास जो फूल-बेलपत्र बेचते हैं उनके दुकान से लम्बे-लम्बे दो गेंदे के फूलों की माला मिली। अब मजबूरी थी लेना क्योंकि कोई ऑप्सन भी नहीं था। एक तो इतनी रात और ऊपर से विवाह का मुहर्त निकला जा रहा था।

गेंदे के फूल देखकर भी नेहा का मूड ऑफ हो गया पर दीपक ने लोगों से भरी महफ़िल में कहा,”जल्दी करो मुहर्त निकला जा रहा है।

माला गुलाब हो या गेंदा,शादी तो हो रही है ना हमारी। जल्दी पहनाओ माला मुझे, इतने समय से इंतजार किया है इस दिन का अब और इंतजार नहीं कर सकता मैं।

दीपक की बातों को सुनकर भरी महफ़िल ठहाकों से गूंज उठी। अब नेहा कर भी क्या सकती थी अपनी मनपसन्द ड्रेस, मैचिंग ज्वेलरी के साथ वो अनमेचिंग गेंदे के फूलों की माला दीपक के हाथों पहनाकर हमेशा के लिए उसके साथ विवाह के गठबंधन में बंध गई।

जब भी नेहा और दीपक अपने विवाह की एलबम देखते हैं तो गले में गेंदे के फूलों की माला को देखकर नेहा को गुस्सा भी आ जाता है और साथ ही दीपक की वो बातों को यादकर हँसी भी आ जाती है।

आज भी दीपक और नेहा खूब हँसते है ये याद कर कि मनपसन्द ड्रेस पर गेंदे के फूलों की माला।

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