खेल तो बस नजरिए का है!

राधा, अरी ओ राधा, जाने कहाँ मर गयी है”…सासूमाँ की आवाज सुनते ही राधा बालकनी से भागकर नीचे आयी..

“कहाँ चली गयी थी, कबसे आवाज दे रही हु तुझे” सासूमाँ ने कहाँ..

बालकनी में बैठे किताबे पढ़ रही थी माँ, कहिये क्या काम है? राधा ने कहा”

मैं जारा बाजार तक जा रही हुं, तेरे लिए कुछ लाना है तो बता दे”..सासूमाँ ने पूछा…

“नहीं माँ, अभी तो कुछ नहीं लाना, आप जाकर आइये”..राधा ने जवाब दिया

राधा की सास जैसे ही मार्किट गयी वैसे ही पड़ोस की अनीता घर में दाखिल हुई…”क्या राधा, तेरी सास किस तरह तुझे बुलाती है..”जाने कहाँ मर गयी है” मैंने अभी-अभी सुना, जब तू बालकनी में थी..ये भी कोई तरीका हुआ भला बात करने का?” अनीता ने कहा..

तब राधा ने बात को टालते हुए कहा “चल छोड़ न, बुरा नहीं मानते ऐसी बातों का, आ चल, चाय पीते है..”

राधा इस बात को हलके में लेगी ये अनीता को समझ नहीं आया..उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा “चाय तो तू पिला ही दे, पर मैंने कई बार सुना है, तेरी सास ऐसे ही तरीके से तुझसे बात करती है, तेरा जी नहीं जलता? मैं होती तो कबका इन्हें सीधा कर दिया होता.. मेरी सास ने मुझसे ऐसे ही तरीके से बात करने को कोशिश की थी, पर मैंने भी उन्हें बहुत अच्छा जवाब दिया था, तब से लेकर आज तक उनकी हिम्मत नहीं हुई मुझसे ऐसे बात करने की..मेरी माँ थोड़े है वो जो उनकी बाते सुनकर लू..पति को समझा रखा है कि अपनी माँ को कह दो इस तरह वो तुम्हें बोल सकती है, पर मेरे साथ नहीं चलेगा..”

अनीता कि बात ख़त्म हुई तो राधा अनीता को आश्चर्य से देखे जा रही थी.. “क्या कह रही है अनीता? मुझे तो मेरी सासुमा हमेशा इसी तरह से बुलाती है..और मुझे उनकी बात का बुरा नहीं लगता कभी.” राधा ने कहा..

“कैसी औरत हो तुम राधा? अभी से आवाज नहीं उठाओगी तो आगे जाने क्या क्या बोलेंगी तुम्हारी सास..अपने ऊपर ऐसे अत्याचार मत होने दो..” अनीता ने कहा..

तब राधा ने कहा “अनीता, ये तो बस नजरिये कि बात है..मेरी सास इसी तरह बुलाती है मुझे..और वो अपने बेटे को भी इसी तरह बुलाया करती है..उन्होंने हम दोनों में कोई फर्क नहीं किया है इस मामले में..और इसी तरह मेरी माँ भी कुछ न कुछ उपनाम देकर मुझे बुलाती है। कभी कही झल्ला भी जाती है मुझपर…यही सोचकर मैं उनकी इस बात पर विरोध नहीं करती..गलत होने पर वो अपने बेटे को भी डांटती है और मुझे भी..जैसे कि मेरी माँ गलत होने पर डाँट देती है, इसलिए मुझे उनकी इस बात पर भी कोई आपत्ति नहीं है..घर के काम कि चिंता उन्हें मुझसे ज्यादा रहती है..समय समय पर मेरी मदद भी करती हैं..मार्किट से सामान भी वही लाती है..जिससे मेरी कुछ मेहनत बच जाती है..इसलिए मैं उनकी इस आदत से संतुष्ट हुं..क्यूंकि मेरी माँ भी यही काम करती है..देख अनीता.. गलत चीज़ो का विरोध जरूर करना चाहिए, पर चीज़े वाकई गलत हो तब.. न कि उन्हें जबरन गलत बना कर उनका विरोध किया जाये.. नजरिये का फर्क होना चाहिए बस. .वरना सही को गलत और गलत को सही बनते देर नहीं लगती…”

अनीता चुपचाप राधा कि बाते सुन रही थी..उसके पास राधा के समझदारी और नजरिये का कोई जवाब नहीं था..”सही कह रही है राधा, मुझे भी अपना नजरिया बदल कर देखना होगा अब’ अनीता ने कहा तो दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़ी…

दोस्तों, जरुरी नहीं जो बात हमें गलत लग रही हो, वो वाकई गलत हो..नजरिया बदल कर देखने से शायद सही भी गलत हो जाये, और गलत बात सही…

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