‘नारकंडा’, जहां बिखरी है बेमिसाल खूबसूरती

सुमन बाजपेयी

हिमाचल प्रदेश में स्थित नारकंडा भारत का सबसे पुराना स्कीइंग डेस्टिनेशन है, जो समुद्र तल से लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की गगनचुंबी पर्वत चोटियों की सुंदरता एवं शीतल, शांत वातावरण खूब आकर्षित करता है। अक्सर जो लोग शिमला जाते हैं, वे नारकंडा अवश्य जाते हैं। 

कालका से नारंकडा जाने में लगभग छह घंटे लगते हैं। सुनकर ही थकान महसूस होने लगती है लेकिन रास्ते में आने वाले ढाबे पर खाना और कुल्हड़ की चाय, लहलहाते पेड़ों और घुमावदार रास्तों के नजारों के साथ कब आपका यह लम्बा सफर कब पूरा हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा। पूरे रास्ते सांप जैसी बलखाती तंग सड़कों के दोनों तरफ कहीं गहरी खाइयां, तो कहीं आकाश को छूती चोटियां देख दिल धड़क उठता है। 

कुदरत की रंगीन फिजाओं में बसा यह छोटा-सा हिल स्टेशन आकाश को चूमती और पाताल तक गहरी पहाडि़यों के बीच घिरा हुआ है। ऊंचे रई, कैल व तोश के पेड़ों की ठंडी हवा यहां के शांत वातावरण में रस घोलती रहती है। यहां पर लोकनिर्माण विभाग तथा राज्य पर्यटन विभाग के गेस्ट हाउस व होटल हैं, लेकिन आकाश और प्राची की बुकिंग पहले से ही एक रिसॉर्ट में हो चुकी थी। दोनों अपना हनीमून मनाने के लिए यहां आए थे।

भारत का सबसे पुराना स्कीइंग डेस्टिनेशन है 'नारकंडा', जहां बिखरी है बेमिसाल खूबसूरती

रिसॉर्ट में ज्यादा मेहमान नहीं थे। वैसे भी यह एकदम शांत जगह पर बना हुआ है। पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई थी। सूरज ढल गया था, इसलिए उस दिन तो कहीं बाहर घूमने जाने का सवाल ही नहीं था। रिसॉर्ट में उस रात हमने बोनफायर का मजा लिया। वहां लगे किवी के पौधे देख बड़ी हैरानी हुई। इतने सुंदर पौधे थे। नर और मादा किवी को संयोजित कर पेड़ लगाया जाता है, यह भी पता चला।

सुबह जब नींद खुली तो रिसॉर्ट की खिड़की से जो नजारा दिखा, उसे देख प्राची मंत्रमुग्ध रह गई। सूरज की किरण या कहें रोशनी के छोटे-छोटे कतरे बादलों की कोख से धीरे-धीरे झांक रहे थे। दूर पहाड़ों की चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी, पहाड़ों की परतों की तरह लग रही थी और एक अद्भुत नजारा प्रस्तुत कर रही थीं। एक पहाड़ को पार करता दूसरा पहाड़, एक चोटी दूसरी चोटी को लांघती..बलखाती चोटियां..उबड़-खाबड़ ..फिर भी गजब का समन्वय और संतुलन।

पहाड़ से निकलते कटावदार, सीढ़ीनुमा आकार और उनके बीच-बीच में बने घर, कहीं कोई बस्ती नहीं। घर भी दूर-दूर बने थे। फटाफट तैयार होकर निकल गए। पहले तो नेचर वॉक ही करते रहे। यहां सेबों के खूब बगीचे हैं। यह देख हैरानी हुई कि सेब सड़कों पर यूं ही बिखरे हुए थे। जो सेब खराब हो जाते थे, उन्हें फेंक दिया जाता था, पर इतनी मात्रा में..।

हाटू पीक: रिसॉर्ट के केयरटेकर ने कहा कि हाटू पीक देखने अवश्य जाएं। यह नारकंडा में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। यहां हाटू माता का मंदिर है। कैब लेकर दोनों वहां के लिए निकल पड़े। कोई छह किमी. की दूरी पर है। यह नारकंडा नेशनल हाइवे 22 पर स्थित है। नारकंडा को पार करके थोड़ी ही दूर पर एक रास्ता कटता है, जो हाटू पीक को जाता है। इस सड़क की चौड़ाई इतनी ही है कि इस पर एक छोटी कार या एसयूवी के सामने अगर बाइक भी आ जाए तो बचाना मुश्किल है। यहां पर आधे रास्ते में एक छोटी-सी झील बना दी गई है। इस छोटी झील के पास ही चाय के एक-दो खोखे हैं।

सुबह की हवा में गुनगुनाहट थी और थोड़ी ठंड का एहसास हो रहा था। ठंड ने कोहरे की चादर बिछा रखी थी। यहां से हिमालय की चोटियां नजर आ रही थीं। हाटू माता के मंदिर पहुंचे तो एक अजीब-सी अनुभूति हुई। यह स्थान लंका से काफी दूर था, लेकिन कहा जाता है कि मंदोदरी हाटू माता की भक्त थीं, जिसकी वजह से ही उन्होंने यह मंदिर बनवाया। वह यहां प्रतिदिन पूजा करने के लिए आती थीं। यह मंदिर पूरी तरह लकड़ी से बना है। 

भीम का चूल्हा: हाटू मंदिर से कोई 500 मीटर की दूरी पर हैं 3 बड़ी-बड़ी चट्टानें। कहा जाता है कि यह भीम का चूल्हा है। मान्यता है कि अपने अज्ञातवास के समय पांडव यहीं आकर रुके थे और इसी चूल्हे पर खाना बनाया करते थे। अगर यह सचमुच उनका चूल्हा था, तो अनायास ही मन में ख्याल आया कि खाना कितनी मात्रा में बनता होगा। कितने बड़े-बड़े बर्तन होते होंगे और कितनी सामग्री लगती होगी। 

नारकंडा का बाजार: यहां का बाजार इतना ही है जितनी एक सड़क। बहुत ही छोटी-छोटी दुकानें बनी हैं, कुछ-कुछ बेढंगी सी, जिनमें मसालेदार सस्ते छोले-पूरी से लेकर कीटनाशक तक मिलते हैं। खास बात यह है कि आप सेब के बागानों के मालिकों की इजाजत से सेब को पेड़ से तोड़कर चख भी सकते हैं। काली मंदिर के ठीक पीछे छोटी पहाड़ी पर कुछ तिब्बती परिवार भी रहते हैं। 

सेब के लिए मशहूर ठानेधार

अगले दिन हमने कोटगढ़ और ठानेधार जाने का प्रोग्राम बनाया, जो सेब के बगीचों के लिए मशहूर हैं। कोटगढ़ और ठानेधार, नारकंडा से 17 किमी. की दूरी पर समुद्र तल से 1830 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। कोटगढ़, सतलुज नदी के बायें किनारे पर स्थित है। अपने यू आकार के लिए प्रसिद्ध एक प्राचीन घाटी है, जबकि ठानेधार अपने सेब के बगीचों के लिए लोकप्रिय है।

कोटगढ़ घाटी से आगंतुक कुल्लू घाटी और बर्फ से ढके हिमालय के पहाड़ों के शानदार दृश्य का आनंद ले सकते हैं। ठानेधार में स्थित प्रसिद्ध स्टोक्स फार्म एक अमेरिकी सैमुअल स्टोक्स द्वारा शुरू किया गया था, जो भारतीय दर्शन से प्रभावित होकर 1904 में भारत आये थे। गर्मियों में जब वह शिमला गए, तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत हो गए और फिर कोटगढ़ में ही बस गए। उन्होंने सेब का बगीचा लगाया जो रेड डिलीशियस, गोल्डन डिलीशियस और रॉयल डिलीशियस सेबों के लिए मशहूर हो गया।

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