काम बहू भी करती हैं पर, ताने नहीं देती

सुमन सुबह जब भी उठती तो पैर हाथों की जकड़न के मारे रोने लगती थी, लेकिन मायका और ससुराल में तो फर्क होता ही है, न भी हिम्मत हो तो उठना तो पड़ता ही है। कोई कह भी दे आराम कर लो, तो भी बहू उस ससुराल की आराम कहां कर पाती है, तो फिर यहां तो वह अपने ससुराल की अकेली बहू जो थी, तो काम सास नहीं बल्कि सुमन ही करती थी।

अभी कुछ दिन पहले ही सुमन को पता चला था कि उसके ये जोड़ों की जकड़न और भी जकड़ती जायेगी उसे क्योंकि यह तो सिर्फ शुरुआत ही थी गठियाबाई की, मन पर भी यह बीमारी बोझ लिए रहती वह और जिंदगी बोझिल महसूस करती थी। वह बस यही सोचती रहती थी कि स्पॉन्डिलाइटिस से पहले ही वह क्या कम परेशान थी जो अब यह एक और दुश्वार रोग लग रहा है।

एक दिन वह खुद को हिम्मत बांधती हुई अपने रोजमर्रा के ही काम जैसे तैसे निपटा ही रही थी, तभी रिश्तेदारों का आगमन सपरिवार हो गया, “बहू कोई बीमार एडमिट है हॉस्पिटल में हमारा, उनको लेकर आये हैं हम यहां डॉक्टर के कहने के बाद, दो-चार दिन के लिए कष्ट उठा लोगी ना हम लोगों के यहां रहने से?” सुमन के चाचा ससुर जी आग्रह करते हुए बोले।

सुमन घर की संस्कारी बहू जो जानी जाती थी बाहर वालों की नजर में, बस कुसंस्कार तो सास ही ढूंढती रहती थी उसमें न जाने कौन सी तरकीब लगाकर, इसलिए कैसे उनके आग्रहपूर्ण निवेदन को अस्वीकार कर सकती थी, “चाचा जी, इस तरह हाथ जोड़कर अपनी बहू का अपमान न कीजिये, ये घर मुझसे पहले आपका है, हक से रहिये|बीमारी में अपने साथ न दें तो फर्क क्या फिर अपनों और परायों का?” सुमन यह बोलते हुए उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में बैठाने लेकर जाती है।

चाचा जी बहू के स्वभाव की बहुत प्रशंसा कर रहे थे, तभी सुमन की सास उनसे भेंट करने के बहाने वहां पर मिट्टी से सने हाथ लेकर पहुँची, जिसको देखकर चाचा जी ने उसकी सास से पूछा, “अरे भाभी जी हाथों पर ये मिट्टी क्यों, अब तो बहू की बनाई रोटी मिल रही हैं आपको खाने के लिए, हाथ मैले होने का तो सवाल ही नहीं होता है फिर?”

यह सुनकर सुमन की सास मुँह बनाते हुए बोली, “रोटी बनाना ही सारा काम थोड़े ही होता है, बाहर आँगन के पास में जो घास जम गई है इस बरसात में, वह क्या सास ही साफ करे!बहू का फर्ज बनता है ना? लेकिन यह तो ये छोटे मोटे काम में ही सारा दिन खराब कर देती है”|

सुमन दिल से बहुत दुखी हुई सास को ऐसा कहते सुनकर, “क्योंकि उसने तो उन्हें कहा ही था कि मम्मी जी माली को बुलाकर करा दूंगी मैं वहां साफ सफाई, क्योंकि ये काम अब मैं नहीं कर पाऊँगी, फिर उन्होंने जिद करके माली को भी नहीं बुलाने दिया औऱ अब ताने मारकर उसका दिल ही नहीं दुखाया है, बल्कि उसे अपमानित भी किया है”।

हिम्मत कर सुमन ने फिर जो मन में था वह अपना एहसास सबके सामने कह ही दिया कि “मैं तो सारे ही काम करती हूं, लेकिन किये हुए काम को लेकर कभी कोई कुड़कुडाहट या उलाहने नहीं देती, जबकि दर्द से घिरी रहती हूं मैं। लेकिन फिर भी फ़र्ज़ निभाने से पीछे नहीं हटती, जबकि मम्मी जी आप कभी कभार जम जाने वाले इस घास को कभी फुर्सत में निकाल क्या देती हैं जिद करके, तो भी मुझे सुनाये बिना चैन नहीं पाती हो?”

“ये तो सही बात कही सुमन बहू तुमने, यही परेशानी तुम्हारी देवरानी को भी है तुम्हारी चाची सास से, क्योंकि यह भी जो करती है, बहू को सुना जरूर देती है और इसके इसी स्वभाव के कारण बहू से इसका छत्तीस का आँकड़ा बना रहता है। मैं भी यही कहता हूं, घर सबका है तो कोई भी काम करे बस काम हो जाना जरूरी है।अब तो हमारी बहू अपनी सास की बातों को एकदम अनसुना करने लगी है, क्योंकि तुम्हारी ये चाची हरदम ताने/उलाहने ही उसको देती रहती थी, जिसके कारण वह मन ही मन दुखी रहने लग गई थी और इसके सामने गुमसुमभी”।

सुमन की सास अपने देवर की ये बातें सुनकर अचंभित हो गई, अपने और सुमन के रिश्ते को लेकर भविष्य की खामोशियों का पूर्वाग्रह में डूबने लगी थी कि कहीं सुमन भी तो इनकी बहू सोनल की तरह तो नहीं हो जाएगीेे मेरे उलाहनों और तानो से परेशान होकर?

इसलिए तुरन्त बोली अपनी देवरानी से, “भई बुढापे का सहारा तो बहू ही होती है, वही गुमसुमरहने लगेगी तो जिंदगी और घर की चमक नहीं खो जाएगी? आज देवर जी ने तो मेरी आँखें ही खोल दी हैं, मैं अबसे सुमन को छोटी छोटी बातों में कभी ताने नहीं देने वाली हूँ”।

अपनी सास के मुंह से ये बात सुनते ही सुमन बहुत खुश हुई और मैं लस्सी बनांकर लाती हूँ कहकर रसोई में चली गई।उसके चाचा ससुर बहुत खुश थे यह सोचते हुए कि एक मरीज को ठीक करने के लिए क्या लाये थे यहां के हॉस्पिटल की एक काम और बन गया।भाभी जी के इस घर की खुशियां सदा आबाद रहने का मैं कारण बन गया, काश मेरी पत्नी भी आज यह बात समझ जाए कि बहू भी सारे काम करती है। मगर वो तो उलाहने नहीं देती है कभी और बस बहू से बेहतरीन रिश्ता बना ले घर लौटकर भाभी जी की तरह।

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