पर्दा

क्या कहूँ इसे मैं ?

घूंघट कहूँ या पर्दा कहूँ,

हिजाब कहूँ या बुर्का कहूँ।

चाहे जो कह लू, पर हकीकत एक ही है।

घूंघट, पर्दा, हिजाब और बुर्का

सब एक ही है।

फर्क बस ये है,मजहब बदल जाता है,

घूंघट में हिन्दू तो बुर्के में मुसलमान कहलाता है।

और पर्दे के सहारे नम्बर फिर नारी का आता है,

लोग कह ही देते हैं पर्दे में रहो,

यहाँ देखकर तुम्हें आदमी का ,

इमान बदल जाता है।

न कर सके वो निगाहों का पर्दा,

इसलिए ये पर्दा हरदम,

औरत का हिस्सा बन जाता है।

हिमायत में लोग परम्पराओं का हवाला देते हैं,

हर बार दम घोटती परम्पराओं से,

नारी की इच्छा को तार-तार कर देते है।

इतने पर भी नहीं रूकते……..

और नारी के बिन पर्दे में रहने को,

बदनाम करना कह देते हैं।

ऐसा नहीं है कि मैं परम्परा

और संस्कार नहीं मानती,

गीता और कुरान नहीं जानती।

ये घूंघट की ओट,

मेरी मजबूरी नही मेरी मंजूरी हो,

मैं बस इस बात को मानती।

लोग कहते हैं, छोड़कर नारी ने पर्दा,

हमें बदनाम कर दिया।

पर पूछती हूँ मैं इन काजी, बाबा, और पंडित से

बांधकर नारी को इन बंधनों में,

कौनसा बड़ा काम कर दिया,

फिर भी नीलाम नारी की इज्जत को,

सरेआम कर दिया।

पर भूल गए ये….

नारी के कपडों ने नहीं,

इनकी नियत ने इन्हें बदनाम कर दिया।

फिजूल में कहते हैं लोग… कि…

नारी ने पर्दा छोड़कर, हमें बदनाम कर दिया।

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