सच में पति परमेश्वर?

रश्मि जी के घर में आने जाने वालों का तांता बंधा हुआ है। कल रात उन्होंने अपनी आखिरी सांसें लीं। बेटे, बेटी, बहू, दामाद को बुला लिया था, शायद उन्हें पहले ही पता चल गया था कि ज़्यादा समय नहीं बचा है।

रश्मि जी, बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन थीं। पूरे मौहल्ले में उनकी बहुत इज़्ज़त थी। युवावस्था, उन्होंने बच्चों की परवरिश करने और बाकी समय, सामाजिक कार्यों में निकाल दी थी। कई साल पहले, उनके पति उन्हें छोड़ कर चले गए थे। गोद में 5 साल की बेटी और दुधमुंहा बालक छोड़ कर, कभी वापस नहीं आए।

रश्मि जी स्वाभिमान की मिसाल थी। कभी मायके या ससुराल वालों के आगे हाथ नहीं फैलाए। कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया। अपना सिर ऊंचा बनाए रखा और जीवन की सभी चुनौतियों का डटकर सामना किया।

शिक्षिका की नौकरी के साथ, ट्यूशन पढ़ाकर, अकेले बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई, उनका भविष्य सुनिश्चित किया। आज उनकी बेटी कॉलेज में प्राध्यापिका है और बेटा इंजीनियर बन गया है। बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के बाद, रश्मि जी एक NGO से जुड़ गई थीं, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के उत्थान और पुनर्वास के लिए काम करता था।

उनके अंतिम संस्कार के लिए जमा हुए लोगों में कानाफूसी भी हो रही थी। प्रभावशाली होने के साथ-साथ रश्मि जी का व्यक्तित्व कुछ लोगों के लिए काफी रहस्यपूर्ण भी था। वैसे तो वो काफी मिलनसार और सरल थीं, लेकिन अपने पति के बारे में कोई बात नहीं करतीं थीं। किसी के पूछने पर केवल इतना ही कहती, “पति परमेश्वर होता है, स्थिति अनुसार जो उचित था, वही हुआ।”

पति के चले जाने के बाद भी, उन्होंने सदैव एक सुहागिन स्त्री के सभी धर्मों का आजीवन पालन किया। हर साल हरितालिका तीज पर अपने घर में विधिवत पूजा करवाती थीं। उनका ऐसा समर्पण देखकर, कुछ लोगों को दया आती थी और कुछ को उनके प्रति सम्मान।

अंतिम संस्कारों से निवृत होकर, बच्चों ने पुश्तैनी मकान के लिए रश्मि जी की वसीयत निकाली। वसीयत के साथ एक हस्तलिखित पत्र मिला।

प्रिय वंशिका और विरांश, 

अगर तुम ये पत्र पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं संसार में अपना योगदान समाप्त कर चुकी हूं। हमारे परिवार की विरासत और सम्मान, तुम दोनों के हाथों में है।

तुम दोनों ही मेरे जीवन का आधार स्तंभ हो। तुम्हारे कारण ही मुझे जीने की प्रेरणा मिली और तुम्हारे पिता के जाने के बाद, तुम दोनों को सक्षम और सशक्त बनाने के उद्देश्य में, मैंने अपना जीवन बिताया है। तुम्हे जीवन में सफलताएं प्राप्त करते देखकर मुझे अपना जीवन सार्थक प्रतीत होता है।

तुम लोगों ने मुझसे कई बार पूछा कि तुम्हारे पिता हमें छोड़कर क्यों और कहां चले गए। मुझे क्षमा कर देना, क्योंकि मैंने तुम्हे हमेशा सच बोलने की शिक्षा दी, परन्तु जीवनभर इतना बड़ा सच छुपा कर रखा।

मेरी शादी, 16 साल की उम्र में तुम्हारे पिता जी से कर दी गई थी। शादी की पहली रात उन्होंने मुझे बुरी तरह जलील किया, मार पीट कर मेरे साथ जबरदस्ती की। मैं सारी रात अकेले रोती रही, वो अपनी हवस बुझा कर सो गए।

बमुश्किल 15 दिन ससुराल में काटे, रोज़ का यही किस्सा था। एक रात, जब मेरे मना करने के कारण उन्होंने मुझे बहुत मारा और मैं रोती हुई तुम्हारी दादी के पास गई, तो उन्होंने मुझे वापस जाकर पत्नी धर्म का निर्वहन करने का सख़्त निर्देश दिया।

 उनके अनुसार स्त्री को अपने पति को “ना” कहने का अधिकार नहीं होता। पत्नी, पति की संपत्ति होती है और पति जैसा चाहे वैसा उपभोग कर सकता है। पति परमेश्वर होता है और नारी को परमेश्वर की यथा संभव सेवा करनी चाहिए, मैं कुछ ना कर सकी।

मैंने अपनी मां को ये बातें बताई तो उनका भी कहना यही था। पति को परमेश्वर मान कर उनकी पूजा करनी चाहिए। सभी ने आश्वासन दिया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। सगे संबंधियों और शुभचिंतकों ने मुझे सलाह दी कि सोमवार के व्रत करने से पति का प्रेम और सम्मान मिलता है। मैंने नियमित रूप से इसका पालन किया, लेकिन तुम्हारे पिता के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। साक्षात परमेश्वर मेरी और परीक्षाएं लेना चाहते थे।

समय के साथ, मुझे लेकर शहर आ गए। हमने अपने घर का निर्माण शुरू किया। उनके व्यवहार को मैंने अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया। तुम्हारे पिता, कभी मेरे रूप पर, कभी मेरे परिवार पर और कभी मेरे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह उठाकर मेरा अपमान करते रहे।

मेरे परिवार से मिलना जुलना बंद करवा दिया। मुझे किसी से बात करने की भी अनुमति नहीं थी। ऐसा करने पर मुझे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता था। उनके व्यवहार के कारण मुझे कई बार गर्भपात का भी सामना करना पड़ा। हर बात के लिए मुझे ही दोषी ठहराया गया। मैं भगवान से अक्सर पूछती थी कि आखिर मैं ऐसा क्या करूं कि मेरे पति का व्यवहार बदल जाए? लेकिन पत्थर की मूर्तियों से कभी कोई आवाज़ नहीं आती है।

जब वंशिका का जन्म हुआ, तो उम्मीद जगी कि नन्ही सी जान को देखकर शायद उनका हृदय पिघल जाएगा, उनका व्यवहार बदल जाएगा। लेकिन ज़िम्मेदारियां और खर्चे बढ़ जाने के कारण उनका दुर्व्यवहार भी बढ़ गया। मार पीट तो आम बात थी। शरीर और आत्मा को तोड़ना भी शुरू हो गया। मेरे बाएं हाथ की कलाई उन्होंने, ऐसे ही बातों बातों में तोड़ दी। एक बार सिर पर प्रहार के कारण इतना रक्तस्राव हुआ कि पूरे फर्श पर खून फैल गया। वो मुझे और वंशिका को इसी हालत में छोड़कर चले गए। वंशिका मात्र 3 साल की थी। जब मुझे होश आया, तो उसके आंसू पोछने के बाद मैंने अपना खून धोया।

सबने कहा, अगर बेटा पैदा हो गया तो शायद उनका हृदय परिवर्तन हो जाए। मेरे पूरे परिवार और समाज ने भी सलाह दी और मैंने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए शुक्रवार व्रत प्रारंभ किए।

2 साल बाद, जब विरांश का जन्म हुआ तो मेरी उम्मीदें वापस जगीं। मुझे लगा मेरी बरसों की तपस्या सफल हो जाएगी। मेरे पति, अंततः परमेश्वर का रूप धर कर मेरे जीवन में आ जाएंगे और मुझे इस ताड़ना से स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन मैं फिर गलत थी। शादी के 10 सालों में मुझे कभी प्रेम का एक शब्द सुनने को नहीं मिला। मैं अपनी और बच्चों की ज़िन्दगी के लिए जितने समझौते करती गई, वो मुझे और ज़्यादा प्रताड़ित करते रहे।

यदि मैंने “तलाक” की बात की तो मेरे घरवालों ने हाथ खड़े कर दिए। मेरे बच्चों के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी कौन लेता। औरत होकर नौकरी करने का तो प्रश्न ही नहीं था। आत्महत्या करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। उस दिन, हरितालिका व्रत था, तुम्हारे पिता जी को खाने में नमक कम लगा। निर्जला होने के कारण मैं खाना चख नहीं सकती थी। उन्होंने दीवार पर थाली फेंक दी और गालियां देते हुए मुझे मारने के लिए दौड़े।

मैं जान बचाने के लिए बाहर आंगन में भाग गई और अंधेरे में छुपने की जगह ढूंढने लगी। वो नहीं रुके और मुझे बाल पकड़ कर घसीटते हुए घर के अंदर ले जाने लगे। मैं जान की भीख मांग रही थी। उन्हें याद दिला रही थी, मैंने आपकी लंबी उम्र के लिए उपवास किया है। उन्होंने हंसते हुए कहा, “तू व्रत करती जा और मैं ज़िन्दगी भर, तुझे अपने पैरों के तले कुचलता रहूंगा! तेरे जैसी औरत की यही औकात है! तुझे मारूंगा नहीं! वरना तेरे पिल्लों को भी मारना पड़ेगा।”

उस वक़्त मेरी आंखें खुली। मेरे पैर में करीब 3 इंच का गहरा घाव था। शरीर में कई जगहों से खून रिस रहा था। मेरा पति; मेरा परमेश्वर, मुझे मारने और अपने पुरुषार्थ को स्थापित करने के लिए वीभत्स रूप में विद्यमान था। उसे मेरे शरीर, हृदय और सम्मान को कष्ट पहुंचा कर आंनद की अनुभूति होती थी। ना तो मैं इस तरह जी सकती थी, ना ही तुम दोनों को मार कर मर सकती थी। 10 वर्षों के प्रयास, विश्वाश और आशाओं को मैंने एक झटके में निरर्थक पाया और मेरी आत्मा इतने वर्षों की वेदनाओं के लावे में उबल पड़ी।

जाने मुझे क्या हुआ और मैंने नज़दीक पड़ा हुआ सरिया उठाकर उनके सिर पर पूरी शक्ति से वार किया। मैं निढाल होकर गिरी, तब मुझे समझ में आया कि उनकी सांसे बंद हो गई थी। कुछ घंटे बाद, मैंने अपने घावों पर मरहम लगाया, फिर वहीं ज़मीन पर खुदाई कर के उन्हें दफना दिया। अब मेरा परमेश्वर केवल मेरी बातें सुन सकता था, लेकिन पत्थर की मूर्तियों के समान, ना तो जवाब दे सकता था, ना ही मुझे दंडित कर सकता था।

 मुझे सिर्फ इतना मालूम था कि तुम दोनों के जीवित रहने के लिए मेरा जीवित रहना आवश्यक है। मैं पूरे जी जान से तुम दोनों की परवरिश में लग गई। तुम्हें बेहतर मनुष्य बनाना मेरे जीवित रहने का एकमात्र ध्येय बन गया। समय के साथ, मैंने घर को पूरा बनवाया। अपने परमेश्वर को सम्मानित करते हुए, मैंने जहां उन्हें दफनाया था, उसी जगह पर पूजा का कमरा बनवाया। पूरे 45 सालों तक मैंने सम्पूर्ण निष्ठा से अपने परमेश्वर की पूजा की, और समस्त व्रत उपवासों का पालन किया। जीते जी, तुम दोनों को ये सच नहीं बता सकती थी। इसलिए आगे की कार्यवाही, तुम्हारे विवेक पर छोड़ रही हूं।

मेरी इच्छा है कि हमारे घर को घरेलू हिंसा की पीड़िताओं के लिए पुनर्वास केंद्र में परिवर्तित किया जाए। बहुत सी महिलाएं, अपने पतियों से सतत प्रताड़नाएं सहन करके अपना जीवन होम कर देती हैं, क्योंकि उनके पास सिर छुपाने तक की कोई जगह नहीं होती। NGO से संधिबद्ध होकर, तुम लोग इस घर में मेरे जैसी अनेकों महिलाओं को आशा की किरण दे सकते हो। यदि चाहो तो पुलिस को अपराध की जानकारी देकर, न्याय प्रिय नागरिक का कर्तव्य निभा सकते हो। जो निर्णय तुम दोनों मिल कर लोगे, मेरी आत्मा को स्वीकार होगा। मेरा आशिर्वाद और स्नेह सदैव तुम्हारे साथ है।

तुम्हारी मां। 

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