चक्की के दो पाट

सिमरन कभी गंगाजल की बोतल उठाती तो कभी लगातार बहते आँसुओं को पल्ले से पोंछ लेती। संयुक्त परिवारों में जेठानी देवरानी का रिश्ता हर रिश्ते से बड़ा होता है, एक साथ सुख-दुख सहते-सहते वो अक्सर असली हमसफ़र सी हो जाती हैं। सिमरन अपनी जेठानी के अंतिम प्रयाण में कोई कमी नहीं रखना चाह रही थी। पैंतीस सालों से जिसके साथ की आदत हो गई हो,  उससे बिछोह की कल्पना करके ही वो सिहर रही थी लेकिन बच्चों की ओर देखकर खुद को बड़ी मुश्किल से संयत कर रखा था। गंगाजल तुलसी लेकर जाने को हुई कि मनीषा घबराते हुए जीजी के कमरे से भागकर आई। उसकी मौन कातर नज़रें…बदहवास सिमरन सुनीता के पास पहुँची तो मानो सुनीता की नज़रों का इंतज़ार खत्म हुआ। लंबी बीमारी से काले और निस्तेज पड़े चेहरे पर दीये की बुझती लौ की आख़िरी भभक जैसी धुँधली सी चमक आई।

“सिमरन, सिमरन… तू और मैं.. एक चक्की के दो पाट.. “ उखड़ती साँसों के बीच सुनीता बोली।

“गलती हो तो हँसकर, कर दो माफ.. “ रोते रोते सिमरन ने वाक्य पूरा किया।

बस ये कुछ शब्द सुनकर देह तो सुनीता की शांत हुई लेकिन जान सिमरन में भी नहीं रही।

घर में रोना पीटना पसर गया। सिमरन की आँखें पथरा सी गई। शून्य में खोई उसकी आँखें वर्तमान से निकलकर बहुत पीछे पहुँच गई जब वो ब्याहकर इस घर में आई थी। सुनीता को सिमरन ने अपनी जेठानी नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी बना लिया था। हर बार उसे लगता कि घर में उसकी अहमियत ही नहीं है। सुनीता की पारखी नज़रों से ये प्रतिस्पर्धा छिपी न रही।

एक दिन गेहूँ पीसते समय उसने ऐसे ही सिमरन से पूछा, “सिमरन, इस चक्की में कौन से पाट की ज्यादा अहमियत है? ऊपरवाले की या नीचेवाले की।”

“भाभीजी, ये तुलना ही गलत है, दोनों ही अपनी अपनी जगह जरूरी है। अकेले पाट से चक्की चलेगी ही नहीं। दोनों पूरक हैं..”

“बिल्कुल हमारी तरह। हम दोनों में से किसी भी एक का महत्व कम नहीं। आज से हम दोनों ये बात याद रखेंगे…

“तू और मैं, एक चक्की के दो पाट…

गलती हो तो हँसकर करदो माफ.. “

इस मूलमंत्र ने धीरे-धीरे सिमरन ने ईर्ष्या के मैल को मन से हटा दिया था, वो सुनीता को जीजी बोलने लगी थी। दोनों ने सच में घर को स्वर्ग बना दिया था। घर का सब कुछ सुनीता देखती तो बच्चों की पढ़ाई लिखाई संबंधी सब काम सिमरन के ज़िम्मे थे। दोनों ने अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ बख़ूबी निभाई। एक बार सिमरन से किसी ने पूछा भी था कि तुम मंदिर में नहीं दिखती? तो उसने जवाब ये ही दिया कि भगवान को अपने साथ ही तो रखती हूँ। अगर धरती पर सच में ईश्वर है तो वो मेरी जीजी है।

“छोटी माँ, छोटी माँ … मम्मी को आख़िरी बार देख लो, लेकर जा रहे हैं उनको।”

थोड़ी देर बाद एक और सेज सज रही थी, चक्की के दूसरे पाट की।

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