बैरी पिया…कभी तो बदलेगा खुद का जीया…

गुरप्रीत जब शादी कर के मयंक के घर यानि अपने ससुराल पहुंची, तो वह नहीं जानती थी कि उसका आने वाला जीवन कैसा होगा। वो तो शादी कर के खुश रहने और पति के प्यार के लिए आई थी। गुरप्रीत को जरा भी संदेह नहीं था कि मयंक उसे इस तरह से और इतना अकेलापन देगा। खुशियों का सपना लिए मयंग के घर आई गुरप्रीत अपने ही पति के प्रति संवेदवहीन हो जाएगी।

जब भी मयंक बाजार जाता तो गुरप्रीत भी उसके पीछे-पीछे गेट तक चली जाती, गाड़ी की आवाज़ जैसे ही ही बाहर से सुनाई देती तो तुरन्त दौड़कर गेट खोलने पहुंच जाती थी। वो इस चाह को लेकर सपने बुनती थी कि मयंक कभी तो अपने साथ उसे भी गाड़ी में बिठा कर ले जाएगा। अपने साथ उसको भी बाहरी दुनिया की आबोहवा से रूबरू करवाएगा। लेकिन वह ख्वाब तो जैसे मयंक की बेरुखी के हज़ारों नजारों के पीछे बोझिल हो गया था। मयंक को जैसे मानो इस बात का एहसास ही नहीं था।

गुरप्रीत जब भी मायके आती तो हर बार एक उम्मीद से आती कि शायद मेरी गैरमौजूदगी मेरे पति को मेरे अस्तित्व का एहसास करा दे, लेकिन गुरप्रीत का तो वह भी सौभाग्य नहीं था कि उनके रिश्ते में नजदीकियां नहीं तो दूरियां ही कुछ सुखद एहसास देकर दूरियों को घटा दें।

मयंक के नजदीक रहकर, ऑफिस और घर की दूरियों के बीच रहकर, मायके और ससुराल से जुदा होकर हर लम्हा गुरप्रीत ने यूँ ही व्यतित किया कि बैरी पिया…..कभी तो बदलेगा खुद का जीया…

मगर ऐसा कुछ गुरप्रीत और मयंक की शादी शुदा जिंदगी से मीलो दूर था। कमाल की बात ये थी कि गुरप्रीत पर जो कुछ बीत रही थी उसका हाल उसके सिवा कोई नहीं जानता था। कभी हारकर मयंक की बेरूखी को एक तरफ रख कर वह खुद ही फोन करती तो मयंक अकसर यह कह कर फोन काट देता कि अभी काम है थोड़ी देर में फोन करता हूं। और फिर अकसर वह भूल जाता कि उसको अपनी पत्नी को भी कॉल करना है।

मयंक की अनजाने में या व्यस्तताओं के कारण गुरप्रीत को दी गई ऐसी बेरुखी ने गुरप्रीत को भी मयंक जैसा ही बना दिया। अब मयंक अगर घर में रहता तो गुरप्रीत सिर्फ खाना, नाश्ता, चाय दिने जाने के लिए जितनी जरूरी बात होती उतनी ही करती थी, वह क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, कहां जा रहा है, कब जा रहा है जैसे सवाल सब त्याग चुकी थी। एक ही घर में दोनों सिर्फ काम से बाद करते थे। पति-पत्नी वाला तो कुछ रह ही नहीं गया था।

यूँ ही वक्त गुज़रता जा रहा था, लबों की खामोशी कभी तो टूटे इस एक ख्वाईश में गुरप्रीत हर दिन गुज़ार रही थी। एक दिन जब गुरप्रीत अपने मायके में थी तो वह अचानक बीमार पड़ गई। डॉक्टर ने बताया कि वह मानसिक अवसाद से गुज़र रही है। जब तक इनका मानसिक अवसाद दूर नहीं होगा तब तक किसी भी तरह के इलाज का भी कोई फायदा नही…

गुरप्रीत के घरवालों की बात सुनते ही मयंक ने कहा, ‘इसको भला क्या अवसाद, रोजी रोटी की परवाह न बिज़नेस के उतार चढ़ाव की?

गुरप्रीत की दोस्त सीमा ने मयंक को कहा कि पत्नी के लिए अवसाद के बाकि कोई कारण हो न हो, मगर पति की बेरुखी भी उसकी जिंदगी को अवसाद से भर देती है। ऐसा सुन मयंक सोच में पड़ गया। सीमा ने फिर कहा पहले वह ऐसी संवेदनशील थी तुम्हारे लिए कि तुम्हारी खुशी के लिए सब कुछ करती, लेकिन तुम्हारी संवेदनहीनता उसके संवेदनशील व्यवहार पर भारी पड़ गई। तुम उस जैसे न बन पाए, परवाह और एहसास को जब तुम पल भर भी न समझ सके और न जता ही सके तो वह तुम्हारे लिए लगातार सोचने लगी। इसी कारण मन ही मन में घुट-घुट कर अब वह तम्हारी जैसी बन गई है। औऱ आज इसी वज़ह से अवसाद की ऐसी स्थिती तक आ पहुंची है।

सीमा की बात सुन कर मयंक को एहसास होने लगा जो उसने अपनी पत्नी के साथ किया वह ग़लत है और उसने उसी समय तय किया कि वह अब इस ग़लती को सुधारेगा।

गुरप्रीत को जब होश आया तो मयंक को पास खड़े देख, खुश हो गई। जिस संवेदना को वह बिना अवसाद के पाना चाहती थी, आज वह कुछ कष्टों के बाद फिर बेताब थी लौट आने को, गुरप्रीत और मयंक के घर व दोनों के दाम्पत्य रिश्ते को एक नया आयाम देने की शुरूआत हो चुकी थी। और फिर वहीं से शुरू हुई दोनों की एक नई ज़िंदगी।

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