रैंगिग ने बदल दी प्यार करने वालो की ज़िंदगी

डॉ नीता की बचपन से ही आदत थी घर लौटकर सीधे बाथरूम में घुस जाने की। बाहर से आने के बाद नहाने की यह आदत उसे दादी ने डाली थी। नहाकर कपड़े पहने, बाल संवारे, थोड़ी-सी क्रीम लगाई। वैसे तो सुंदर है नीता, पर ज़रा-सा समय दे शरीर को तो रूप और निखर आता है।

एक लिफ़ाफ़ा ड्रेसिंग टेबल पर रखा था, कौतूहल से उठाकर देखा, मां की चिट्ठी… पर चिट्ठी क्यों? शायद ही कोई दिन गुज़रता होगा, जब मां से बातें न होती हों। मां उसकी चिंता में घुली जा रही हैं, जबकि कोई कारण नहीं है चिंता करने का।

नीता ने बायो केमिस्ट्री से पीएच.डी की और उसके बाद स्कॉलरशिप लेकर तीन साल के लिए अमेरिका गई थी। वहीं से एक विदेशी दवा कंपनी में एक उच्च पद से मुंबई आ गई थी। जहां वह डायरेक्टर के पद पर काम कर रही थी। नाम, पैसा, प्रतिष्ठा से भरा जीवन सब तो है उसके पास, बस कमी है तो एक…. कि कुंवारी है। मां की चिंता का कारण भी बस यही है। नीता चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी है। छोटे तीनों भाई-बहनों की शादी हो चुकी है और सबसे बड़ी नीता अभी तक कुंवारी है तो मां चिंता ही तो करेगी।

नीता के अविवाहित रहने के पीछे कोई दुखांत प्रेम प्रसंग भी नहीं था। बस, उसे कुंवारी रहने की धुन भर है। वो माता-पिता की आज्ञाकारिणी भी रही, लेकिन बस विवाह को लेकर अपनी ज़िद पर अड़ी रही। वर्षों पहले डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ केमिस्ट्री में एम.एससी. करने लगी वो।

मेडिकल की Entrance Exam में पूरे इलाके में प्रथम आई थी, मेडिकल में दाख़िला लिया, होस्टल भी गई। एक ही दिन क्लास अटेंड की और मन ऊब गया। चली आई डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ कर। लाख समझाने पर भी नहीं मानी और एम.एससी. करने लगी। उसके पापा तो बेटी के डॉक्टर न बनने का दुख मन में लिए ही संसार छोड़ गए।

अब मां की सबसे बड़ी परेशानी है उसके कुंवारी रहने से। कोई भी समझ नहीं पाता कि जो इतनी कोमल हृदय की है, सबसे समझौता करके चलने वाली है, वो विवाह के मुद्दे पर इतनी दृढ़ता से कैसे टिकी है। ईश्वर ने तो उस पर रूप, गुण, सम्मान और धन की वर्षा की है, पर कैसे चूक गए उसके भाग्य में नारीत्व की गरिमा देने से। न तो वह पत्नी है, न किसी परिवार की बहू और न ही किसी की मां, वो अगर कुछ है तो बस डॉक्टर नीता। उसके रूप-गुण को देख अच्छे घर से उसके लिए रिश्ते आए, लेकिन हताश हो लौट गए।

मां को वास्तव में उसकी चिंता है, उम्र ढल चुकी है, पर सबसे बड़ी बेटी नीता का घर अभी तक नहीं बसा। उसके विवाह के लिए मां लगातार प्रयास कर रही है।

इस बार भी मां ने रिश्ता भेजा है और उनका रुख़ भी कड़ा है। अपनी प्रिय सहेली की बहन का लड़का, उच्च डिग्री प्राप्त सर्जन, दिल्ली में अपना नर्सिंग होम है, अति सुदर्शन, कोई व्यसन नहीं, चरित्रदोष नहीं और व्यवहार-कुशल भी है। उसके लिए मां ने जाने-पहचाने संस्कारी परिवार का लड़का देखा है। भाई-बहनों को भी बहुत पसंद है। उन लोगों को भी नीता का फ़ोटो पसंद आया। मां ने उसके विषय में जितनी सूचना ली है वो सब बहुत अच्छी है। सब कुछ सेट हो गया है, बस दोनों एक बार मिल-बैठ विचार-विमर्श कर लें तो मुहूर्त निकलवा लेते हैं।

बालकनी में बैठी नाता पत्र पढ़ रही है तभी कामवाली चाय रख के चली जाती है। मन तो नहीं था पर फिर भी चाय पी ली उसने। मां की उसके लिए चिंता से जुड़ा है उनका ममत्व, वो मां का दर्द समझती है, उनकी भावनाओं का सम्मान करती है। इसलिए आज मां के पत्र ने हिला दिया उसे। साथ में लड़के का फ़ोटो भी है।

वास्तव में सुंदर है मनीष। कोई भी लड़की एक झलक में दीवानी हो सकती है, उसे भी अच्छा लग रहा है पर… जाने क्यों बड़ा ही जाना-पहचाना-सा चेहरा लग रहा है। लगता है पहले भी कहीं मिल चुकी है। पर कब…कहां, याद नहीं आ रहा। चाय पीते-पीते वो गहरी चिंता में डूब गई। मां के प्रस्ताव, प्रयास और चिंता का औचित्य समझ रही है वो। बेटी कितनी भी योग्य और स्वावलंबी हो, मां उसे योग्य वर के हाथों में सौंपकर ही निश्चित हो पाती है। नीता को भी अब थोड़ा-थोड़ा अकेलापन तो लगने ही लगा है।

आज मां के पत्र ने उसके अंतर्मन को छुआ। मां ने वर्षों पहले ही पत्र लिखना बंद कर दिया था, फ़ोन पर ही बात करती थीं। उसी मां ने आज उसे इतना लंबा पत्र छोटे बच्चे की तरह समझाकर लिखा है। पलकें भीग उठीं नीता की। मां की व्यथा को समझ वो चुपचाप बैठी सोचती रही।

वर्षों से तो अपनी ही ज़िद पर अड़ी रही। अब मां की इच्छा को मान देना चाहिए। वैसे विवाहित जीवन इतना भी बुरा नहीं होता। अपने भाई-बहनों को देखती है, तो उनके मुख पर सुख आह्लाद छलकता है। मत-विरोध अवश्य होता होगा, पर पति-पत्नी का रिश्ता इतना गहरा होता है कि विरोध मिटते दो मिनट की भी देर नहीं लगती। बहुत सोच-विचार के बाद उसने मां की इच्छा को मान देने का ही मन बना लिया।

शायद यह संयोग ही होगा, तभी अचानक उसकी कंपनी दिल्ली शिफ़्ट हो रही है। नीता को तीन महीने बाद दिल्ली में ही रहना पड़ेगा। उसने इस बात की सूचना मां को देते हुए विवाह के लिए अपनी सहमति दे ही दी।

मां ने फ़ोन पर बताया कि मनीष के घरवाले विशेषकर मनीष खुद बहुत उत्साहित है इस ख़बर से। नीता का फ़ोटो तो उसे पहले से ही बहुत पसंद था, थोड़ी-सी मन में चिंता थी कि वो मुंबई में नौकरी करती है। इतनी बड़ी नौकरी छोड़ दिल्ली आना, न तो वो चाहेगी और न ही उचित होगा उस पर दबाव डाल नौकरी छुड़वाना। अब वो चिंता भी नहीं रही। शांति से घर बस जाएगा।

नीता के आने की जानकारी ले मनीष ने होटल में कॉर्नर टेबल भी बुक करवा लिया, जहां बैठ दोनों बातें करेंगे। नीता ने सोचा था कि मनीष शायद फ़ोन या इंटरनेट पर उसके साथ संपर्क बनाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ। उधर से संपर्क साधने का कोई प्रयास ही नहीं हुआ। इस बात से नीता मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई। वो एक हद तक संस्कारी है, पुरानी परंपरा और रीति-रिवा़ज़ का सम्मान करती है। उसे अच्छा लगा कि विदेश जाकर भी लड़के में अपने रीति-रिवाज़ के प्रति कोई अवहेलना नहीं आई है। उसने मन ही मन बिना देखे, अपने होने वाले पति को ख़ुद को समर्पित कर दिया।

नीता फिरोज़ी रंग का सूट पहन, अदब से दुपट्टा ओढ़ा कर पापा की गाड़ी लेकर होटल चली गई। अब वो मन से विवाह के लिए एकदम तैयार थी। कॉर्नर टेबल पर डॉक्टर साहब पहले से ही उसकी प्रतीक्षा में बैठे थे। उसे देखते ही खड़े हो स्वागत किया और फिर बैठने को कहा। फिर दोनों ने एक-दूसरे को अपना परिचय दिया। पहली नज़र में ही नीता मनीष के अंतर्मन में बस गई। नीता सुंदर तो है ही, उम्र के अनुसार भोली भी लगती है। उनका मन पुलकित हो उठा, आंखों में भावी जीवन के सपने तैरने लगे।
उन्होंने वेटर को चाय का ऑर्डर दिया। आपसी परिचय के बाद दोनों बातें करने लगे। असल में इतने सालों तक करियर बनाने में दोनों ही इतने व्यस्त रहे कि विवाह की बात मन में आई ही नहीं। घर में सब उनके विवाह की बात उठाते, तो वो टाल जाते, वरना रिश्तों की कोई कमी नहीं थी। अब जब उनका नर्सिंग होम ख़ूब अच्छे से चल गया, तो उनको भी लगा अब अपने लिए सोचने का समय आ गया है।


नीता का फ़ोटो तो पहले भी देखा था, लेकिन पसंद आज आई थी, जब उसको साक्षात् देखा। लगा इतने दिनों का इंतज़ार सफल हो गया। वो पहले परिचय में ही नीता से निकटता बढ़ाने के लिए प्रस्तुत हुए।
द्वंद्व तो नीता के मन में था। जब उसने डॉक्टर साहब का फ़ोटो देखा था तब पसंद तो आए थे, पर मन में एक उथल-पुथल-सी थी कि यह चेहरा कुछ पहचाना-सा है। कहीं देखा है, पर कहां कुछ याद नहीं आ रहा था? इतने लोगों से मिलना पड़ता है, सबका फ़ोटो मन में छप जाना संभव तो नहीं है, पर मनीष का फ़ोटो मानो मन में गहराई तक उतर गया था। लेकिन कब…? कहां…? पर इस समय नीता दिमाग पर ज़ोर देकर भी याद नहीं कर पा रही।

गठीला बदन, उजली आंखें और आकर्षक स्टाइल… ये सब पहले कहां देखा है उसने? क्यों नहीं याद आ रहा…? उसका दम घुटने लगा… अंदर ही अंदर वो छटपटाने लगी। उसकी स्मरणशक्ति बहुत ही तेज़ है, पर क्यों नहीं याद कर पा रही इनको?

डॉक्टर साहब चाय का कप उठाते हुए बोले, “चाय लीजिए। मैं तो आपके बारे में सब कुछ जान चुका हूं। पता नहीं आप मेरे विषय में कितना जानती हैं?”

उसने अपनी उलछन के चलते चाय का कप उठाते हुए कहा कुछ ख़ास नहीं, बस मां की सहेली से कोई रिश्ता है आपका और आप सर्जन हैं।” यह सुनकर डॉक्टर साहब हंसे पड़े।

यह हंसी, यह बोलने का अंदाज़ भी जाना-पहचाना होते हुए भी उसे याद क्यों नहीं आ रहा? कितनी हैरानी की बात है यह?

वो हंसे, बात आगे बढ़ाते हुए बोले, “जितना आपने जाना है, बस उतना ही मेरा परिचय है। पर थोड़ा और जानना चाहें तो बताता हूं। मैंने एम.बी.बी.एस. किया है, पूना मेडिकल कॉलेज से और फिर एम.एस. किया…”
“नहीं…” अब और कुछ सुनने की ज़रूरत नहीं थी नीता को। उसे सब याद आ गया था। हां… सब कुछ… साथ ही उस घटना का नायक भी। आश्‍चर्य है, जिसके प्रति जीवनभर की घृणा, रोष, मन के इतने गहरे तक उतर गई थी और पंद्रह साल के समय के अंतराल में ज़रा भी धूमिल नहीं हुई, उसे देखते ही क्यों नहीं पहचान सकी? उम्र की थोड़ी छाप तो है, पर इतनी नहीं कि पहचान ही न पाए।

आंखों के सामने पंद्रह साल पहले की वो घटना आ गई, जब आंखों में सपने संजोए, नीता पहले दिन मेडिकल कॉलेज गई थी। उसका सपना था, एक सफल डॉक्टर बन गरीबों की सेवा करना, पर क्लास तक पहुंचने से पहले ही उसके सीनियर्स ने रोक लिया रैगिंग के लिए और उस रैगिंग टोली के कैप्टन थे यही डॉक्टर साहब मनीष।

नीता भय से कांप रही थी, रो रही थी.. दया की भीख मांग रही थी, पर वो सब दरिंदे भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़े थे उस पर। उस घटना ने उसके मन में ऐसा ठप्पा लगाया कि उसके सारे सपने बिखर गए। यही खलनायक थे उन पशुओं की टोली के, जो उसके शरीर को नोच रहे थे। वो असहाय-सी केवल रो रही थी। उस दिन नीता की इन सौम्य आंखों ने भूखे भेड़ियों की आंखों की भयावहता देखी थी। यह चेहरा तो तभी उसके मन पर छप गया था, जिसकी त्रासदी से वो आज तक नहीं उबर पाई। देखते ही पहचान क्यों नहीं पाई वो इस भूखे भेड़िए को?

“चाय लीजिए”

चौंककर अतीत से वर्तमान में लौट आई नीता। सजग हुई, पर चाय के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। एकटक डॉक्टर साहब को देखती रही। वो मन ही मन पुलकित हो उठे। हां… इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने भी नीता को देखते ही पसंद कर लिया। आज तक कितनी ही युवतियों से उनका संपर्क हुआ, पर नीता की तरह कोई भी पहली ही नज़र में मन में अपनी जगह न बना पाई। उनकी आंखों में सुख, शांतिपूर्ण जीवन के सपने गहरा आए।

“मुझे तो आपके बारे में और किसी जानकारी की आवश्यकता नहीं, यदि आप मुझसे कुछ जानना चाहती हैं तो आप निःसंकोच पूछ सकती हैं?”

धीरे-धीरे नीता सहज हुई। एकटक देखना समाप्त हो गया था, खिड़की से खुले आकाश को देख रही थी। अब आकाश से नज़रें हटा नीता ने मनीष की ओर देखा। मनीष को एक ज़ोर का झटका लगा।

यह क्या? प्यारी-सी नीता, जिसको मन ही मन मनीष अपना जीवनसाथी चुन चुका हैं, उसकी आंखों में अनुराग, समर्पण का भाव नहीं, बल्कि वहां तो घृणा, नफरत और प्रतिशोध की आग जल रही थी।

क्या यह उसका भ्रम है? पर भ्रम तो नहीं हो सकता… ऐसा क्यों है? जीवन में आज पहली बार नीता से मुलाकात हुई है, पर…?

“आपको मैं अच्छी तरह से जानती हूं और क्या जानना चाहूंगी आपके बारे में?” वो व्यंग्यात्मक लहजे में बोली।
“आप… मुझे जानती हैं? पर कैसे? लेकिन हम तो पहली बार…”

मनीष की बात को बीच में ही रोक कर नीता ने कहा… “जी नहीं, यह हमारी दूसरी मुलाक़ात है…”

“दूसरी मुलाक़ात…? लेकिन…”

“आपको याद नहीं। पर मैं कैसे भूल सकती हूं उस मुलाक़ात को, जिसने मेरे डॉक्टर बनकर जनसेवा करने के सपने को पैरों तले कुचलकर मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी थी?” उसका मुंह खुल गया।

“मैं… मैंने…?”

“बस, एक बार ही मुलाक़ात हुई थी आपसे और वो पहली ही मुलाक़ात इतनी महत्वपूर्ण थी कि उसकी याद अमिट छाप छोड़ गई मन की गहराई में। उसके आतंक से अभी तक उबर नहीं पाई। भयानक सपना बन आज भी मेरे मन में छाया है वो दिन, यहां तक कि मेरे सारे सपनों को छीन जीवन को ही तोड़-मरोड़ कर रख दिया।”

“मैं समझा नहीं, इतने सारे आरोप मेरे सिर? और मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूं, क्यों…?”

“क्योंकि मेरी जैसी कितनी ही असहाय लड़कियां आपका शिकार बन चुकी हैं। किस-किस को याद रखेंगे आप?”

“मेरा शिकार…? कुछ भी नहीं समझ में आ रहा है मुझे।”

नीता अब एकदम सहज थी, आज बॉल उसके कोर्ट में है। सच कहा है किसी ने कि विजयी वही होता है, जो अंतिम बाज़ी जीतता है। यह अंतिम बाज़ी है, हार-जीत का फैसला यही बाज़ी करेगी।

“इतने वर्ष बीत चुके, लेकिन आज भी वह घटना मुझे ताज़ा लगती है। आंखों में सपने लिए एक लड़की पूना मेडिकल कॉलेज में आई और पहले ही दिन आपकी रैगिंग का शिकार हो, डर से मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर लौट जाने को विवश हो गई, पर बात यहीं पर ही समाप्त नहीं हुई। वो संपूर्ण जीवन के लिए इतनी आतंकित हो गई पुरुषों से कि अभी तक घर ही न बसा पाई।”

लगा, शरीर से किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो, ऐसे स़फेद पड़ गया था मनीष। अब इतने साल पहले की वो घटना उन्हें स्पष्ट याद आ गई। कुछ ज़्यादा ही डरी थी वो लड़की, रो रही थी बुरी तरह से। यहां पर बैठे-बैठे डॉक्टर साहब, जो सपनों का महल बना रहे थे, नीता की बातें सुनने के बाद वो चरमराकर गिर पड़े। नई उम्र की मस्ती के नाम से जो भूल उनसे हुई, उसकी सज़ा दे नीता उठकर चली गई। एकदम सूनी आंखों से डॉक्टर साहब उसको जाते देखते रहे। उनको लगा एक अंधेरी, गहरी खाई में धकेल नीता उनको उम्र कैद की सज़ा दे गई।

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