सरकारी नौकरी छोड़कर बने करोड़पति किसान

हम कहे कि जहां हर ओर सरकारी नौकरी पाने की होड़ मची रहती है, वहीं कुछ ऐसे भी युवा हैं, जो नौकरी छोड़ रहे है शायद यह बात आपको भी थोड़ी अजीब लगेगी। आप भी सोचेगें कौन छोड़ता है सरकारी नौकरी को, आपका सोचना भी सही है। लेकिन कुछ युवा ऐसे भी है जो सरकारी छोड़ कर खेती को अपना रहें हैं। ऐसे लोग दूसरे युवाओं के लिए मिसाल बन रहे हैं। उनमें से ही ऐसे ही एक हैं हरीश धनदेव। हरीश एलोवेरा की बड़े स्तर पर खेती कर रहे हैं। उनके खेत का एलोवेरा अब पंतजलि जैसी कंपनियां खरीद रही हैं।

राजस्थान के जैसलेर के हरीश धनदेव (30 वर्ष) ने साल 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद दिल्ली के एक कालेज में एमबीए करने लगे। लेकिन एमबीए की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर की नौकरी मिल गई। यहां महज दो महीने की नौकरी के बाद उनका मन नौकरी से हट गया। हरीश दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने की सोचने लगे।

इसी बीच हरीश को लगा की उन्हें खेती में कुछ करना चाहिए। हरीश बताते हैं कि नौकरी छोड़ने के बाद वह वहां के पारंपरिक ज्वार और बाजरा से अलग कुछ करना चाहते थे। इसी बीच वह बीकानेर कृषि यूनिवर्सिटी में गए औऱ वहां के वैज्ञानिकों ने उन्हें एलोवेरा की खेती करने की सलाह दी। 

उसके बाद हरीश दिल्ली में कृषि पर आयाजित एक्सपो में भी गए। वहीं पर उन्हें एलोवेरा की नई तकनीक और नए जमाने की खेती के बारे में जानकारी हासिल की। एक्सपो में एलोवेरा की खेती की जानकारी हासिल करने के बाद हरीश ने तय किया कि वो एलोवेरा की खेती करेंगें। यहीं से कहानी में मोड़ आया और नई शुरुआत को एक दिशा मिल गई। दिल्ली से लौटकर हरीश बीकानेर गए और एलोवेरा के 25 हजार पौधे लेकर जैसलमेर लौटे। बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय से 25 हजार प्लांट लाए गए और करीब 10 बीघे में उसे लगाया गया। आज की तारीख में हरीश 700 सौ बीघे में एलोवेरा उगाते हैं, जिसमें कुछ उनकी अपनी ज़मीन है और बाक़ी लीज़ पर ली गई है।

जब एलोवेरा के पौधे लेकर आए तो लोगों ने कहा कि जैसलमेर में पहले भी कई लोगों ने एलोवेरा की खेती की थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। हरीश बताते हैं कि लोगों ने कहा कि कई लोगों ने पहले भी इसकी खेती की थी लेकिन वो असफल रहे। जब हरिश ने इसकी वजह की तलाश की तो पता चला कि मार्केटिंग न हो पाने की वजह से ऐलोवेरा की खेती में लोग असफल रहें। हरीश कहते हैं कि शुरु में सब कुछ पता था ऐसा नहीं है। खेती की शुरुआत होते ही जयपुर से कुछ एजेंसियों से बातचीत हुई और अप्रोच करने के बाद हमारे एलोवेरा के पत्तों की बिक्री का एग्रीमेंट इन कंपनियों से हो गया। इसके बाद हमने अपने यहां ही एलोवेरा की पत्तियों से निकालना शुरु किया।

एक दिन जब हरिश इंटरनेट पर देख रहे थे तो उन्हें पता चला कि पतंजलि एलोवेरा का सबसे बड़ा खरीददार है। और फिर क्या था उन्होंने पतंजलि को मेल भेज डाला। उनका जवाब आया और फिर उनसे मिलने उनके प्रतिनिधि भी आए। पतंजलि के आने से चीजें बदली और आमदनी भी। करीब डेढ़ साल से हरीश एलोवेरा पल्प की सप्लाई बाबा रामदेव द्वारा संचालित पतंजलि आयुर्वेद को करते हैं।

वह बताते हैं कि हमारे यहां उत्पाद में क्वालिटी कंट्रोल का खास ध्यान रखा जाता है। हम अपने उत्पाद को लेकर कोई शिकायत नहीं चाहते तो प्रत्येक स्तर में हमें इसका खास ध्यान रखना होता है कि हम जो पल्प बना रहे हैं उसमें किसी प्रकार की कोई मिलावट या गड़बड़ी ना हो।

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