किताबों से दूर होती जा रही युवा पीढ़ी

किताबों से अच्छा उपहार शायद ही कोई हो सकता है.. किताबों के बिना जीवन जैसे मानों अधूरा है.. किताबों से दोस्ती हो जाए तो बुरी आदतों से भी छुटकारा मिल जाता है। किताबों को दोस्त बना लिया जाए तो हम उनके साथ हर तरह की बात भी शेयर कर पाते हैं। लेकिन आज हम किताबों से दूर होते जा रहे हैं। लगातार बढ़ रही दूरियों के कारण नई पीढ़ी सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों को समझ नहीं पा रही है. लोकमान्य तिलक ने भी कहा था- “मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्योंकि जहां यह रहेंगी वहां स्वयं ही स्वर्ग बन जाएगा”। 
गुलजार साहब ने भी क्या खूब कहा है, “किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं… महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं, जो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है।“ 

एक बार फिर किताबें दोस्त बनना चाहती हैं, एक बार फिर से दोस्ती करना चाहती हैं। शायद फिर से बातें करना चाहती हैं। जिस तरह पंडित नेहरू जी ने कहा था कि किताबों के बगैर मैं दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं। किताबें हमारे अंदर से कभी संस्कारों को समाप्त नहीं होने देती हैं। जब तक आप में जानने की जिज्ञासा है तब तक आप किताबों से दूर नहीं जा सकते। किताबें तब भी आपका साथ नहीं छोड़ती जब सारी दुनिया आपके खिलाफ हो जाती है। 
आज दुःख इस बात का है कि आज हमारी जिदंगी जिस भागमभाग से गुजर रही है उसमें हमारे पास इतना भी समय नहीं है कि हम कुछ समय किताबों के साथ बिता सकें। बच्चा सिर्फ स्कूली किताबों से ही नहीं सीखता बल्कि कोर्स के अलावा दूसरी किताबों से भी बहुत कुछ सीखता है। 

रेलवे स्टेशन पर किताबों के साथ लगी सभी किताबें अश्लील साहित्य से अटी पड़ी है। जहां आप अपने परिवार के साथ खड़े नहीं हो सकते। सेक्स और नकारात्मक गतिविधियों से लिप्त कर ये सब युवाओं को नकारात्मक सोच की और ले जाता है। जिससे हमारे समाज की आने वाली पीढ़ी गलत दिशा की और जाती है। 
आइए, एक बार फिर किताबों को अपनी दोस्त बना कर एक बार फिर उन से कुछ अच्छा सीखे। 

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